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पिता स्वर्ग, पिता धर्म, पिता ही परम् तप

Hardoi Updated Sun, 16 Jun 2013 05:30 AM IST
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‘फादर्स डे की शुरुआत के बाबत बताया जाता है कि वर्ष 1966 में अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जानसन की घोषणा के बाद हर साल जून के तीसरे रविवार को मनाया जाने लगा। फादर्स डे सभी देशों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। भारत में भी इसे बढ़ चढ़कर मनाया जाने लगा। जन्म देने वाले माता-पिता का सम्मान शायद हर देश में बढ़ चढ़कर होता है, पर भारत की बात करें तो सम्मान से कहीं ऊपर माता-पिता को पूजने की बातें सामने आती है। चाहे श्रवण कुमार रहे हों या फिर कोई और। माता-पिता की कीमत एक बच्चे के लिए क्या होगी, यह उस बच्चे से बेहतर कोई और नहीं जानता। बुद्धिजीवियों का कहना है कि भारत में माता-पिता की पूजा की जाती है। शास्त्री उमाकांत अवस्थी का कहना है कि माता-पिता की तुलना इस संसार में किसी और वस्तु से नहीं की जा सकती। इसे भारतीय संस्कृति कहें या फिर संस्कृति से ओत प्रोत लाडलों की अपने पिता के प्रति कृतज्ञता। इसमें कोई दो राय नहीं कि जन्म देने वाली मां की तुलना किसी और से भी की जा सकती है, पर अंगुली पकड़ कर सही राह दिखाने वाले पिता का कर्ज भी कभी नहीं चुकाया जा सकता। इसलिए मां के लिए मदर्स डे का एक दिन खास रखा गया, तो पिता के प्रति कृतज्ञता जताने को भी इस दिन को महत्वपूर्ण मानना चाहिए। हालांकि, फादर्स डे पर उतना उत्साह देखने को नहीं मिलता।’
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हरदोई। मां की गोद से लेकर घुटनों के बल घर के आंगन मेें घिसलना भले ही हमें याद न हो, पर मां का दुलार और पापा की अंगुली के सहारे चलना हमारे मनोमस्तिष्क में कहीं न कहीं आज भी विद्यमान है। जिंदगी के जिस पड़ाव पर आज हम हैं, वहां तक पहुंचने में कई-क ई बार मां की नरमी ने जहां हमको झुकना सिखाया है, वहीं पिता की डांट ने हमें संभलना। माता5पिता के नाम तो हर दिन हैं, पर पितृ दिवस पर कहीं न कहीं हर किसी को संकल्प लेना चाहिए कि यदि हम अपने पिता को संतुष्ट व प्रसन्न रखेंगे तो हम भी संतुष्ट व खुश रहेंगे।
जिले में भी राजनीतिज्ञ से लेकर बड़े अफसर तक का कहना है कि आज जो भी वह हैं, अपने पिता की प्रेरणा या फिर उनके बताए रास्तों पर चलकर ही। बाबा मंदिर के संचालक प्रीतेश दीक्षित का कहना है कि पिता बनने के बाद उन्होंने जाना कि वह उनके पुत्र तन्मय और तन्मय उनके लिए क्या है। पिता का दायित्व जरूर बड़ा है, पर तन्मय में वह हमेशा अपना बचपन देखते हैं। युवा व्यवसायी प्रिंस अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे सम्राट के रूप में एक बार फिर बचपन देखा है। पिता की भूमिका अब ठीक तरह से समझा हूं। अपने पिता को कोटि कोटि प्रणाम करते हुए कहना चाहता हूं कि जो सुख माता-पिता की सेवा में है, कहीं नहीं।
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जो संस्कार उनके पिता ने उन्हें दिए वह अपने सम्राट को वहीं देना चाहते हैं। अंगुली थामकर पैरों पर खड़ा करने वाले और एक सही दिशा दिखाने वाले पिता के सम्मान में एक दिल से अच्छा लगने वाला एक उपहार खोजने को लोग गिफ्ट कार्नरों से लेकर शोरूमों तक में देखने को मिले। कोई बधाई कार्ड देख रहा था, तो कोई पिता के लिए स्मार्ट फोन पसंद करने को मोबाइल की दुकान पर दिखाई दिया। इसके अलावा कपड़ों के शोरूमों पर भी पिता को देने के लिए बेटे-बेटियां शर्ट आदि खोजती दिखाई दीं। फादर्स डे को लेकर दुकानों व गिफ्ट कार्नरों में भी चहल पहल दिखाई दी।
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केस-एक
नाम व पता छप जाए तो शायद उस पिता के लिए नाइंसाफी होगी, पर शहर के ही एक मोहल्ले में रहने वाले पिता का उसके बेटे के लिए संदेश जरूर है कि बेटा जहां रहो खुश रहो। बेटा माता-पिता का कर्ज कभी नहीं चुका सकता, पर बेटा कर्ज भले ही न चुका पाओ पर पिता उन्हें जरूर मानना। इनका बेटा अपने पैरों पर खड़े होने के बाद शहर में ही दूसरे घर में परिवार के साथ रहने लगा है, तो पिता मोहल्ले वालों के सहारे हैं। एक यही उदाहरण नहीं, बल्कि कई ऐसे उदाहरण भी है जिनमें बेटे पथ भ्रमित होकर पिता को भूल चले हैं।
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केस-दो
शहर के ही अच्छे परिवार से ताल्लुख रखने वाले एक पिता पिछले कुछ माह से अकेले बड़े घर में रहकर अपने उस बेटे का इंतजार कर रहे हैं, जो विवाह करने के बाद घर से जा चुका है। वह पिता के बारे में भले ही कोई फिक्र न करे, पर पिता का शायद ही कोई पल हो, जब वह उसे याद न करें। उनका कहना है कि नहीं कोई ऐसी बात नहीं, अभी थोड़ा सा नादान है। जब खुद पिता बनेगा तो समझ जाएगा कि एक पिता के दिल में एक बेटे के लिए जगह क्या होती है। उन्हें यकीन है कि वह जल्द घर लौटेगा।
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‘बच्चे की प्रथम पाठशाला उसका घर होता है और टीचर उसके माता-पिता। मां नरम होती है, तो पिता दुलार करते हैं, पर उन्हें कहीं न कहीं कठोर होना पड़ता है, लेकिन वहीं कठोरता बच्चे को आगे जाकर अपने आप के वजूद को बनाने में सहायक होती है। उन्होंने भी पिता से सिद्धांतों पर चलने की वचनबद्धता को सीखा, जो ताउम्र उनके साथ चलेगी।’ प्रकाश कुमार, डीपीओ
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‘शास्त्रों मेें पिता को स्वर्ग व सबसे बड़ी तपस्या का दर्जा दिया जाता है। बच्चे को पिता ही अच्छे व खराब का बोध कराता है। उन्होंने भी अपने पिता से कुछ ऐसा सीखा, जो आज उनके जीवन में आगे बढ़ने में उनकी मदद कर रही है। पिता से क र्म ही पूजा के सिद्धांतों को सीखकर अपने जीवन में उतारा है।’ डा. अमरजीत सिंह अजवानी
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‘पिता-मां परिवार की गाड़ी चलाने और बच्चों का पालन पोषण करने को एक गाड़ी के दो पहियों के समान होते हैं। बच्चे को संस्कारित एवं उनके भविष्य के निर्माण को जहां मां को नरम रहना पड़ता है, वहीं पिता को कभी कड़ा रुख अपनाना पड़ता है। पिता का बच्चों के लिए किया त्याग व उनके अहसास आगे जीवन में पता चलते हैं। पिता से सहनशीलता, धैर्य व सेवाभाव सीखा है और अपने जीवन का आधार बनाया है।’ योगेश त्यागी, प्रांतीय महामंत्री, जूनियर शिक्षक संघ
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‘पिता किसी के जीवन के लिए कितने विशेष होते हैं, यह जैसे जैसे समय आगे बढ़ता जाता है, उसका महत्व पता चलता रहता है। कभी दुलार कर तो कभी डांटकर न सिर्फ बच्चों में संस्कार भरते हैं, बल्कि बच्चों के सबसे बड़े भविष्य निर्माता पिता ही होते हैं। पिता से प्रेरणा, मार्गदर्शन व सेवाभाव के गुण सीखे हैं, जो उन्हें आजीवन आगे और आगे ले जाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।’ वासू खन्ना, प्रमुख व्यवसायी
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