मैनपुरी। समय का चक्र या कलियुग असर कहिए, विधूना उपेक्षित है। कभी यहां महर्षि मार्कंडेय का तप सतयुग का तेज बनकर चमकता था। पुराण गवाह हैं, प्रलय को भी यहां नतमस्तक होना पड़ा। सतयुग से कलियुग के आरंभिक काल तक सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैला यह अरण्य ऋषियों-मुनियों की तपस्या से धन्य होता रहा। जाने कितनी कथाएं यहां बिखरी पड़ी हैं। कहते हैं, महात्मा विदुर का महल भी यहीं था। साल में एक बार लगने वाला 15 दिन का मेला महर्षि और पौराणिक कथाओं को ताजा कर देता है।
विधूना गांव जिला मुख्यालय से मैनपुरी-सिरसागंज रोड पर करीब 22 किमी दूर है। यहां लगभग एक किलोमीटर परिधि में फैले विदुर टीला पर चार दशक पूर्व कराए गए उत्खनन में पत्थरों की दीवार, कुआं, कई मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन आदि निकले थे। कहते हैं कि ये महात्मा विदुर के महल का ध्वंसावशेष हैं। था। उन्हीं के नाम से इस स्थान का नाम विधूना पड़ा। कुछ मूर्तियां आज भी टीले पर खुले में पड़ी हैं। कई को लोग उठा ले गए। उत्खननस्थल पर धूल-मिट्टी से भर गया है। टीले के अंदर विशाल खजाने समेत अनेक रहस्य छिपे होने की चर्चा लोग करते हैं। और तो और, चोरी-छिपे खजाने की तलाश में जहां-तहां खोदाई भी लोग करते रहते हैं।
विदुर टीले पर कब्जे की होड़
विदुर टीला अभिलेखों में सरकारी भूमि दर्ज है लेकिन टीले पर कई मकान बना लिए गए हैं। समय रहते प्रशासन न चेता तो टीला और पौराणिक महत्व के अवशेषों का भी नामोनिशान मिट जाएगा।
समस्त तीर्थों का ‘भांजा’ है यह तीर्थ
महर्षि व्यास के सभी 18 पुराणों में महर्षि मार्कंडेय का जिक्र मिलता है। मार्कंडेय पुराण तो उन्हीं पर आधारित है। पुराणों के मुताबिक प्रलयकाल में सिर्फ महर्षि मार्कंडेय ही जीवित बचे। एक वटवृक्ष के शीर्ष पर विराजमान महर्षि ने वहीं से भगवान के दर्शन भी किए। तप, पवित्रता के कारण पूज्य आदि ऋषि के तपस्थान की तुलना भांजे से की गई। भांजा पूज्य और पवित्र ही नहीं दुलारा संबंध भी है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर यहां के सरोवर में स्नान और मंदिर में पूजन से सभी तीर्थों के दर्शन का फल प्राप्त होता है। कहते हैं जहां शिवमंदिर है वहीं महर्षि ने तपस्या की थी।
पंद्रह दिवसीय मार्कंडेय मेला कल से
घिरोर (ब्यूरो)। महर्षि मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना में छह नवंबर (कार्तिक पूर्णिमा) से मेला आरंभ होगा। इस धार्मिक मेले में देश भर से लोग आते हैं। पंद्रह दिन के इस धार्मिक आयोजन में एक लाख से अधिक लोगों के जुटने के कारण इसे लक्खी मेला भी कहा जाता है।
क्षेत्र का यह एकमात्र मेला भी है। तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। दुकानें-झूले आदि लग गए हैं। सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात है। यहां के सरोवर में देश के कोने-कोने से आकर हजारों श्रद्धालु स्नान व प्राचीन शिव मंदिर में पूजाकर मनौतियां मांगते हैं। मेला प्रांगण के विशाल वटवृक्ष पर मिट्टी के डब्बू में जौ भरकर फेंकते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने वालों की मनौती पूरी होती है। क्षेत्रीय नागरिकों में भी मेले के प्रति भारी उत्साह है।