ब्रज की सांस्कृतिक राजधानी वृंदावन को वन से नगर संस्कृति की ओर उन्मुख करने में यमुना के आकर्षण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यमुना की ओर सजे घाट और मंदिर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। वृंदावन के तत्कालीन रमणीक वातावरण के आगे जलमार्ग से चलने वाले व्यापारी ही नहीं बल्कि धार्मिक पर्यटक और बड़े-बड़े राजे-रजवाड़े श्रद्धा के इस केंद्र पर नतमस्तक हुए।
बताया जाता है कि आरंभ में यमुना पर कच्चे घाट थे। 18वीं शताब्दी से यहां भारत की विभिन्न रियासतों के राजा-महाराजाओं, रानी-राजमाताओं और धनिकों ने पक्के घाट व मंदिर बनवाने का क्रम शुरू किया जो काफी बाद तक चला। तत्कालीन ब्रिटिश कलक्टर और इतिहासकार एफएस ग्राउस ने अपनी पुस्तक में वृंदावन के 32 घाटों का उल्लेख किया है। अन्य संदर्भों से यह संख्या 40 तक ठहरती है।
दतिया (मध्य भारत) के राजा पारीछत देव जू महाराज द्वारा विक्रम संवत 1879 में उनकी ब्रजयात्रा के क्रम वृंदावन की परिक्रमा के दौरान 24 घाटों को देखने का उल्लेख मिलता है। महाराजा के राजकवि नवल सिंह प्रधान द्वारा रचित ‘ब्रजभूमि प्रकाश पोथी’ में घाटों का तत्कालीन वैभव तक दर्ज है। बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की परिवर्ती पीढ़ी की रानी कमल कुंवरि तो अपनी ब्रजयात्रा के दौरान वृंदावन के घाटों का सौंदर्य देख कह उठीं-
‘घाट एक से एक सुहाये सोभा लगत अपारी।
कहां लगि सबके सुजस बखानौं लघुमत समझ हमारी।।’।
पांडुलिपि लेखन का प्रमुख केंद्र बने घाट
वृंदावन की पंचकोसीय परिधि को स्पर्श करने वाला यमुना तट मुद्रण तकनीकी के विकास से पहले ग्रंथ लेखन का बड़ा केंद्र रहा। ‘वृंदावन के वैष्णव लिखिया: एक अज्ञात परंपरा की खोज’ पुस्तक में लेखक डा. राजेश शर्मा ने लिखा है कि वृंदावन स्थित यमुना के युगल घाट, केशी घाट, शृंगार वट, विहार घाट कभी ग्रंथ लेखन के लिए भी प्रसिद्ध थे। धार्मिक पर्यटकों की मांग के अनुरूप यहां तैयार पोथियों ने न केवल अखिल भारतीय विस्तार पाया बल्कि ब्रिटिश काल में वृंदावन में लिखी गईं पांडुलिपियां यूरोप तक पहुंचीं। ये आज भी वहां संरक्षित हैं।
लघु भारत था यमुना का जलमार्ग
देश की विभिन्न रियासतों ने वृंदावन में यमुना के जलमार्ग को खूब सजाया। कालांतर में यहां लघु भारत का दृश्य दिखाई देने लगा। दक्षिण भारत, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के रजवाड़े व धनिकों द्वारा बनवाए गए घाट आज भी यहां मौजूद हैं। वृंदावन शोध संस्थान के ग्रंथागार प्रभारी डा. ब्रजभूषण चतुर्वेदी बताते हैं कि देवालयी संस्कृति के अंतर्गत यमुना संस्कारों में है। ब्रज में यमुना संस्कृति से प्रेरित कई पांडुलिपियां संस्थान के ग्रंथागार में हैं।