एप डाउनलोड करें
विज्ञापन

अंसारी वोटरों को लुभाने वाला बनेगा जिलाध्यक्ष!

Mau Updated Mon, 17 Feb 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

मऊ । लोकसभा चुनाव सिर पर है, ऐसे में संगठन में फेरबदल की गुंजाइश कम ही रहती है। लेकिन समाजवादी पार्टी ने अचानक मऊ जिले के संगठन को भंग कर दिया है। साइकल यात्रा के सफल आयोजन के बाद कार्यकारिणी भंग कर 10 फरवरी के बाद शैलेंद्र यादव उर्फ साधु को जिलाध्यक्ष पद से हटा दिया गया। लेकिन नए अध्यक्ष की ताजपोशी को लेकर असमंजस बरकरार है। संगठन की जिला इकाई भंग होने के बाद से इस पद के लिए जोरआजमाइश शुरू हो गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

घोसी संसदीय क्षेत्र अल्पसंख्यक बाहुल्य है। अकेले मऊ कस्बे में करीब एक लाख अल्पसंख्यक मतदाता हैं। पूरे संसदीय क्षेत्र में 18 लाख मतदाताओं में से इनकी संख्या करीब पौने तीन लाख है। इसमें सत्तर प्रतिशत के आसपास अंसारी मतदाता हैं। संभवत: इसी आंकड़ा को देखते हुए एकता मंच ने मऊ सदर से कौमी एकता दल के विधायक मोख्तार अंसारी को घोसी संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार घोषित किया है। इससे सपा को अंसारी वोटों को कटने का डर भी है। लेकिन सपा के साइकल संदेश यात्रा के प्रभारी रहे रविंद्र यादव ने कहा है कि ऐसी कोई बात नहीं है। इतिहास के पन्नों को पलटे तो सामने आता है कि 2004 में अल्ताफ अंसारी के जिलाध्यक्ष रहते हुए घोसी संसदीय सीट पर सपा ने कब्जा जमाया था। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सपा एक बार फिर अल्पसंख्यक मतदाताओं को रिझाने के लिए किसी अल्पसंख्यक को जिलाध्यक्ष बना सकती है। इधर, जिलाध्यक्ष पद से हटाए गए शैलेंद्र यादव का कहना है कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए संगठन में परिवर्तन किया जा रहा है। अब सवाल उठता है कि संगठन के जिलाध्यक्ष का पद किसे सौंपा जाएगा।
पूरी उम्मीद है कि मऊ जैसे अल्पसंख्यक बाहुल्य जिले में किसी अल्पसंख्यक की जिलाध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो सकती है। तीन बार सपा जिलाध्यक्ष रह चुके अल्ताफ अंसारी का कहना है कि नया जिलाध्यक्ष कौन होता है यह प्रदेश मुखिया के स्तर पर तय होगा। लेकिन एक बात सच है कि यहां सपा को जीत तभी हुई है, जब कोई अल्पसंख्यक जिलाध्यक्ष रहा। उन्होंने श्रेय लेने से बचते हुए कहा कि 2004 में चंद्र देव राजभर यहां से सपा के सांसद चुने गए थे। संयोग से तब मैं ही जिलाध्यक्ष रहा। ध्यान देने की बात यह है कि इस चुनाव में सपा का जोर खासकर अल्पसंख्यक वोटरों पर है। हालांकि अब तक भाजपा तथा कांग्रेस ने भी अपने उम्मीवार घोषित नहीं किए हैं लेकिन जो चुनावी परिदृष्य है उसके हिसाब से सारा जोर जातीय जोड़ घटाने पर ही है। यह हाल करीब करीब सभी दलों का है। ऐसे में जिलाअध्यक्ष पद पर सपा किसे तरजीह देगी यह देखने की बात है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
एप में पढ़ें