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इंदिरा, लोहिया और अल्पसंख्यक आवासों के आवंटन में खेल

Mau Updated Fri, 19 Sep 2014 05:31 AM IST
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मधुबन। गांवों में सरकारी आवासों का आवंटन ग्राम प्रधान से लेकर ब्लाक स्तर तक के कर्मचारी, अधिकारी की कमाई का जरिया बन गया है। एक आवास के लिए आवंटी को सरकार की ओर से 70 हजार रुपये मिलते हैं लेकिन इसे पाने के लिए आवंटी को घूस के रूप में 20 हजार रुपये पहले देने पड़ते हैं। रिश्वत न दे पाने की स्थिति में ग्राम प्रधान और सेक्रेटरी अपात्रों को सरकारी आवास आवंटित कर देते हैं।
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गांवों में इंदिरा आवास, लोहिया आवास, अल्पसंख्यक आवास आदि योजना के तहत बीपीएल धारकों को छत मुहैया कराने का प्रावधान है। बीपीएल कार्ड गरीब होने का सरकारी प्रमाणपत्र है, जो बहुत कम वास्तविक गरीबों के पास होता है। मुख्य रूप से यही वजह है कि आवास आवंटन में भ्रष्टाचार का यह प्रवाह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। जिले के दो ब्लाकों के एक-एक गांव में आवास आवंटन में बरती गई अनियमितता तथा भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच में भ्रष्टाचार उजागर हुआ।

केस एक
आवास आवंटन में धांधली की पहली शिकायत फतहपुर मडाव ब्लाक के गांव अलीपुर की मिली थी। ब्लाक के एडीओ एसआईवी की जांच में अलीपुर में इंदिरा आवास आवंटन में एक दर्जन से अधिक मामले फर्जी पाए गए। गरीबों को दरकिनार कर कोठी, खेतिहर और नौकरी चाकरीवालों को आवास आवंटित कर दिया गया था। जांच के बाद अपात्रों का आवंटन रद कर आवास निर्माण के लिए जारी प्रथम किश्त के 35 हजार रुपये रिकवरी का आदेश दिया गया लेकिन इस खेल के दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, इसका पता नहीं चल सका। ब्लाक के बीडीओ का कहना है कि उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी लेकिन कब इसका जवाब उनके पास नहीं था।
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केस दो
दूसरा मामला दोहरीघाट ब्लाक का है। इस ब्लाक के गांव परशुरामपुर में इंदिरा आवास के 16 आवंटियों में से 11 फर्जी निकले। डीएम के आदेश पर आवास आवंटन प्रकरण की जांच उप कृषि निदेशक ने किया था। यहां भी गरीबों को ठेंगा दिखाकर कोठी अटारी वालों को आवास आवंटित कर दिए गए थे। जांच रिपोर्ट डीएम के पास पहुंची तो आवास पाए अपात्र लोगों से रिकवरी कराने का आदेश दे दिया गया। अपात्रों तक रिकवरी का आदेश अभी पहुंचा भी नहीं है।

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