मऊ। आज विश्व पर्यावरण दिवस है। साल दर साल मनाए जा रहे इस दिन की महत्ता हाल के सालों में बढ़ती ही जा रही है। कारण कि वर्तमान औद्योगीकरण और अंधाधुध शहरीकरण के दौर में जंगल व जमीन का दायरा रोजाना सिमटता ही जा रहा है। जिसके चलते पर्यावरण असंतुलन दिनोंदिन बढ़ रहा है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति कार्यरत दर्जन भर से ज्यादा स्वयंसेवी संस्थाएं भी जागरूक नहीं है। भूमंडलीकरण के इस दौर में पूर्वांचल के पिछड़े जिलों में शुमार जनपद पर्यावरण संरक्षण में भी पिछड़ा नजर आता है। एक रिपोर्ट...
उपजाऊ भूमि चार फीसदी सालाना हो रही कम
कृषि योग्य खादर और बांगर भूमि से युक्त जिले का क्षेत्रफल 1716 स्क्वायर किलोमीटर है। लेकिन शहरीकरण ने एक औसत के अनुसार सालाना तीन से चार प्रतिशत तक खेती की भूमि को कम किया है। पेड़ों की कटाई से मिट्टी का क्षरण भी साल दर साल बढ़ रहा है। उप कृषि निदेशक डा. आशुतोष मिश्र का कहना है कि बढ़ती आबादी इसकी एकमात्र वजह है। लेकिन ऐसे में भी हम योजनाबद्ध तरीके से कृषि योग्य भूमि का बचाव भी कर सकते हैं। साथ ही उसकी उपज को भी बढ़ा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक को प्रयास करना होगा। अनुपयोगी भूमि पर भी वृक्ष लगाए जाएं, वृक्षों को काटा न जाए।