बहुजन समाज पार्टी इस चुनाव में भी पूरी तरह से धड़ाम हो गई। सपा ने तो एक सीट जीतकर खाता खोल लिया। लेकिन बसपा का तो यहां खाता भी नहीं खुल पाया। वर्ष 2012 के चुनाव के साथ ही इस बार भी ऐसा लगातार दूसरे विधानसभा चुनाव में हुआ है। न तो यहां बसपाइयों का सिपहसालारों में परिवर्तन काम आया और न ही सोशल इंजीनियरिंग चली। वेस्ट की अन्य सीटों पर भी बसपा की हालत खराब ही रही।
चार सीटों पर तो सीधे बाहर
इस बार बसपा की हालत और खराब हो गई। चार सीटें ऐसी रहीं, जहां बसपा दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी। सिवालखास में दूसरे नंबर पर सपा रही। यहां बसपा ने दलित-मुस्लिम दांव खेला था, जो ध्वस्त हो गया। सरधना में सपा दूसरे नंबर पर रही और बसपा तीसरे पर। यहां भी बसपा का दलित-मुस्लिम समीकरण फ्लाप रहा। हस्तिनापुर में जरूर बसपा दूसरे नंबर पर रही। किठौर में बसपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई। यहां गुर्जर-दलित समीकरण को जनता ने नकार दिया। मेरठ कैंट में बसपा दूसरे नंबर पर रही। यहां बसपा ने जाट-दलित दांव खेला था। लेकिन यह खरा नहीं उतर सका। जबकि शहर में बसपा तीसरे नंबर पर चली गई। यहां बसपा ने खेला तो पंजाबी तथा दलित कार्ड था पर यह दांव भी सभी सीटाें पर सबसे कमजोर साबित हुआ। दक्षिण में जरूर आमने-सामने बसपा मुकाबले में रही, पर वहां भी अरमानों पर पानी फिर दिया।
सारे सूरमा हो गए धड़ाम
बसपा ने वेस्ट यूपी में अपनी पूरी ताकत लगाई थी। नसीमुद्दीन सिद्दीकी को जहां इसकी सीधी जिम्मेदारी दी गई थी, तो कहा गया था कि मुस्लिमाें को खासतौर पर साधें। आखिरी समय में पूर्व सांसद शाहिद अखलाक को भी मुस्लिमों को साधने का जिम्मा दिया गया। इससे पहले नसीमुद्दीन के पुत्र अफजाल को भी मुस्लिमों को साधने केलिए लगाया गया। लेकिन किसी का जादू नहीं चला। जनता ने एक तरह से इन्हें नकार दिया और जमकर सपा को वोट किया। इसके अलावा वेस्ट यूपी प्रभारी की कमान एमएलसी अतर सिंह राव को दी गई थी। वे भी कोई छाप नहीं छोड़ पाए। यहां तक कि उनकी सिफारिश पर शहर सीट से पंकज जौली को टिकट दिया गया, जिनका प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा। वे 13 हजार का आंकड़ा भी नहीं छू पाए। पिछले चुनाव में इस सीट पर लड़े बसपा के सलीम अंसारी को 13164 वोट मिले थे। जौली यह आंकड़ा भी नहीं छू पाए।