अधिकांश लोग रिटायरमेंट को बुढ़ापा आना, उम्र गुजर जाना या अब कुछ नहीं बचा जैसी बातों के साथ स्वीकार करके बैठ जाते हैं। लेकिन शहर में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने रिटायरमेंट को जिंदगी का ठहराव नहीं माना, बल्कि एक नई जिंदगी का आगाज किया। इंजीनियर, बैंक मैनेजर जैसे महत्वपूर्ण पदों से रिटायर होने के बाद ये लोग पर्यावरण और समाजसेवा में लगे हुए हैं। तो कुछ ऐसे हैं जिन्होंने बच्चों में संस्कारों की सीख देने की पहल शुरू की है। ये वो सब करना चाहते हैं जो ये नौकरी की बंदिशें और वक्त की कमी के कारण नहीं कर पाए। ऐसे ही लोगाें पर फोकस करती यह रिपोर्ट...
शहर की सफाई में थोड़ा सा योगदान
मवाना शुगर फैक्ट्री से रिटायर राजकुमार बैंबी दिल के मरीज हैं। रिटायरमेंट को 10 साल से अधिक का वक्त हो गया। कृष्णकांत बैंबी घर पर बैठकर टीवी देखने या आराम करने के शौकीन नहीं हैं। प्रत्येक रविवार को शहर की सफाई के लिए योगदान भी देते हैं। पहल एक प्रयास से जुड़कर राजकुमार बैंबी हर संडे सफाई कार्य करते हैं। संस्था के युवा सदस्य इतने जोश और जुनून से काम नहीं कर पाते, जितना कृष्णकांत बैंबी 70 साल की उम्र में श्रमदान करते हैं। राजकुमार कहते हैं कि घास निकालना, मिट्टी उठाना, डालना, नालियों की सफाई करना कोई छोटा काम नहीं हैं। मुझे अच्छा लगता है कि मेरे दो से तीन घंटे की मेहनत से शहर में थोड़ी सुंदरता आई है। देश के लिए कुछ करने का मन हमेशा से था। अब सरकारी नौकरी से छुट्टी मिल चुकी है, इसलिए अपना सपना पूरा कर रहा हूं।
घर-घर, जल संरक्षण का संदेश
मवाना निवासी बुजुर्ग अवधपाल आठ साल पहले मवाना शुगर मिल से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद से ही पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उन्होंने कदम बढ़ा दिए। अवधपाल का मुख्य काम गांवों में तालाबों पर हो रहे कब्जों को दूर कराकर तालाबाें को पुनर्जीवित करना है। अब तक तीन तालाबों को कब्जामुक्त करवाने के साथ ही एक नया तालाब भी खुदवा चुके हैं। अवधपाल कहते हैं कि नौकरी में रहते हुए मैं अपने शौक को वक्त नहीं दे पाता था, इसलिए मैंने सोच रखा था कि रिटायरमेंट के बाद ये सब काम करूंगा।
चित्रों संग बसाया नया संसार
इस्माईल डिग्री कॉलेज में पेंटिंग विभाग की एचओडी रहीं डॉ. आशा आनंद ने चित्रों के साथ नया संसार शुरू किया है। वह पांच साल पहले रिटायर हुई थीं। आशा ने बताया कि जॉब के समय पर पेटिंग के लिए समय नहीं निकाल पाती थी। अब एकदम फ्री हूं, इसलिए अपनी हॉबी को खुलकर वक्त दे पाती हूं। रोजाना तीन से चार घंटे अपने पेंटिंग वर्क में लगाती हूं। बकौल आशा आनंद लोग रिटायरमेंट को जिंदगी खत्म होना समझ लेते हैं, ऐसा नहीं हैं। मैंने तो रिटायरमेंट के बाद अपनी पसंद के काम शुरू किए हैं। पांच सालों में श्रीकृष्णा पर पूरी सीरीज तैयार कर दो एग्जीबिशन भी लगा चुकी हूं।
बेसहारा बच्चों को देती हैं वक्त
आरजी डिग्री कॉलेज से रिटायर डॉ. कुसुम अग्रवाल ने समाजसेवा को जीवन का हिस्सा बना लिया है। गढ़ रोड निवासी डॉ. कुसुम अग्रवाल खाली वक्त में सत्यकाम सेवा आश्रम के बच्चों को वक्त देती हैं। डॉ. कुसुम कहती हैं बेटियों की शादी हो चुकी है, सभी बाहर सेटल हैं। बच्चे तो कहते हैं कि विदेश में उनके साथ रहूं, लेकिन मुझे अपना देश अपना शहर ही अच्छा लगता है। उन्होंने बताया कि वे सत्यकाम आश्रम के कैंसर पीड़ित बच्चों को हैंडवर्क भी सिखाती हैं। इसलिए रिटायरमेंट थकने का नाम नहीं बल्कि कुछ नया शुरू करने का मौका देता है।
बंदियों और उनके बच्चों को दे रहीं शिक्षा
केंद्रीय विद्यालय पंजाब लाइंस से सेवानिवृत्त शिक्षिका रमा नेहरू महिला बंदियों और उनके बच्चों क ो पढ़ा रही हैं। वह 10 साल रोज जेल जाकर बंदियों को अक्षर ज्ञान सिखाती हैं, साथ ही उनकी काउंसिलिंग भी करती हैं। इसके अलावा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इन्हें सिलाई, कढ़ाई, क्रोशिया भी सिखाती है। उनका कहना है कि बंदियों और उनके बच्चों को पढ़ाकर बड़ा सुकून मिलता है। रमा रोजाना चार घंटे का वक्त जेल में बंदियों और उनके बच्चों के साथ बिताती हैं। मलिन बस्तियाें में जाकर शिविर भी लगाती हैं।
पहले पढ़ाई अब पर्यावरण की शिक्षा
बैंक कॉलोनी निवासी रामपाल सिंह तोमर 10 साल पहले बतौर प्राध्यापक सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने लोगों को पर्यावरण की शिक्षा देना शुरू कर दिया। रामपाल सिंह तोमर रोजाना दो घंटे कॉलोनी के पार्क में सफाई व सौंदर्यीकरण के लिए देते हैं। साथ ही कॉलोनी के बच्चों को देशसेवा की शिक्षा भी देते हैं। रामपाल सिंह तोमर ने कॉलोनी के बच्चों के लिए ज्ञानवाटिका नाम से कक्षा शुरू की है। जिसमें बच्चों को देशभक्ति से जुड़ी कहानियां सुनाते हैं और देशसेवा के प्रति जागरूक करते हैं। साथ ही साथियाें के साथ मिलकर शहर की सफाई के लिए भी कार्यरत हैं।