देश की सियासत में प्रधानी चुनाव शुरू से ही काफी महत्वपूर्ण रहा। 1951 के पहले पंचायत चुनाव से लेकर वर्तमान में हो रहे प्रधानी चुनाव में काफी बदलाव दिख रहा। प्रधानी के ताकत व रसूख में बढ़ोतरी के साथ चुनावी सियासत में काफी बदलाव हो चुका है।
प्रदेश के पहले पंचायत चुनाव 1951 में प्रधान का चुनाव खुली मीटिंग में लोगों से हाथ उठाकर कराया गया था। इससे प्रत्याशियों को अपने विरोधी व समर्थकों की संख्या साफ पता चल जाता था।
उसके बाद और वर्तमान में गुप्त मतदान के जरिए हो रहे प्रधानी चुनाव में जहां अधिकांश मतदाता मौन है तो प्रत्याशी भी अपने समर्थक व विरोधी मतदाता को पूरी तरह समझने में नाकाम साबित हो रहे हैं।
पहले पंचायत चुनाव के गवाह रहे अरिमर्दन शुक्ल कहते हैं कि उस दौर में लोगों के बीच काफी खुलापन था, इसी के साथ चुनावी रंजिश के कारण इतने झगड़े भी नहीं होते थे।
चुनाव खत्म होने के बाद मीटिंग के दिन दोनों पक्ष आपस में मिलकर गांव के हित में विकास कार्यों को प्राथमिकता देते थे। अब तो प्रधानी के कारण चुनाव से लेकर पूरे पांच साल तक गुटबंदी होने से गांव का माहौल बेहद तनावपूर्ण और खराब बना रहता है।
सेवानिवृत्त शिक्षक पंडित शिवप्रसाद व श्रीराम ठकुराई कहते हैं कि उस दौर में चुनाव खत्म होने के बाद मीटिंग के दिन दोनों पक्ष आपस मिलकर गांव के हित में विकास कार्यों को प्राथमिकता देते थे। अब तो प्रधानी के कारण चुनाव से लेकर पूरे पांच साल तक गुटबंदी होने से गांव का माहौल बेहद तनावपूर्ण और खराब बना रहता है।
वर्तमान पंचायत चुनावों को लेकर मिठाईलाल कहते हैं कि अब तो बिना नोट के वोट मिलना काफी मुश्किल हो चुका है। यहां तक कि अधिकांश घरों के मतदाता अपने वोट इसलिए बांटकर देते है कि जो अधिक कीमत देता है उसे अधिक वोट देना तय कर देते है।
ऐसे में प्रत्याशी मतदाताओं का रूख भांप पाने में नाकाम हो जाते है। कुछ स्थानों पर प्रधानी चुनाव में दबंगई के चलते हिंसा की घटनाएं होती हैं। जानकार कहते है कि धन बल से प्रभावित प्रधानी चुनाव के ऐसे माहौल में किसी साफ स्वच्छ छवि के व्यक्ति का चुनाव लड़ना ही काफी कठिन हो गया है।