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ग्यारहवीं के छात्र ने लगाई फांसी

Sitapur Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
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महोली (सीतापुर)। ग्यारहवीं के छात्र ने गुरुवार रात घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उसका शव घर की ऊपरी मंजिल पर बने कमरे में फांसी के फंदे से झूलता मिला। रिश्तेदारों की मानें तो वह अपने परिजनों से किसी बात को लेकर नाराज था। सूचना पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
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महोली कोतवाली क्षेत्र के ग्राम बधइया निवासी जगदीश शुक्ला का पुत्र मुकेश (17) सरस्वती विद्या मंदिर महोली में 11वीं कक्षा में पढ़ता था। वह गुरुवार रात अपने चचेरे भाई सौरभ शुक्ला के साथ छत पर सो रहा था। रात में उसने कुंडे में गमछे के सहारे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। सुबह कमरे में उसका शव देख घर में हड़कंप मच गया। आसपास के लोग भी जमा हो गए। सूचना पाकर पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने शव नीचे उतरवाकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। छात्र की मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। वहीं परिजनों की मानें तो मुकेश किसी बात को लेकर अपने परिजनों से नाराज था। उसने गुरुवार की शाम खाना भी नहीं खाया था।

पढ़ने में काफी तेज था
मुकेश पढ़ाई-लिखाई में काफी तेज था। वह महोली कस्बे के सरस्वती विद्या मंदिर में कक्षा 11 में पढ़ता था। 2011-12 में उसने हाईस्कूल की परीक्षा में 77 फीसदी अंक हासिल किए थे। उसका एक छोटा भाई और दो बहनें भी हैं। सभी का रो-रोकर बुरा हाल है। घर में मातम का माहौल है। आसपास के लोग भी मुकेश को काफी मिलनसार बता रहे थे। उसके फांसी लगाने से हर कोई हैरत में था।
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होनहारों का मौत को गले लगाने का सिलसिला जारी
मासूमों द्वारा आत्महत्या का कदम उठाए जाने से हर कोई हैरत में है। जिले में पिछले कुछ माह में अचानक ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। एक माह के दौरान चार छात्रों ने खुदकुशी कर ली। चार अक्तूबर को महमूदाबाद में सीता इंटर कॉलेज के छात्र विकास (17) ने अपने घर के कमरे में फांसी लगा ली। इसी दिन सदरपुर इलाके के अनुज (16) का शव एक पेड़ पर फांसी के फंदे से झूलता पाया गया। वहीं 18 सितंबर को सीतापुर शहर के आर्यकन्या इंटर कॉलेज की छात्रा प्रतीक्षा अवस्थी (16) ने विद्यालय परिसर में ही फांसी लगा ली।

आत्महत्या की बढ़ती मनोवृत्ति के पीछे काफी हद तक संबंधित व्यक्ति का पारिवारिक माहौल भी जिम्मेदार होता है। अभिभावकों के लिए यह जरूरी है कि वह अपने बच्चों से नियमित रूप से बातचीत कर उनकी मुश्किलों को सुने। संवाद स्थापित करना बेहद जरूरी है।
डॉ. वीरेश बाजेपयी, मनोचिकित्सक
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