सीतापुर। जिले के ‘माननीय’ सरकारी महकमों की ठेकेदारी में खासा दखल रखते हैं। विधायक, सांसद अथवा एमएलसी बनने से मानों इन्हें ठेकेदारी में दखलंदाजी करने का लाइसेंस मिल जाता है। फिर अपने ‘रसूख’ के बूते ‘माननीय’ ठेकों को एसी में बैठकर ‘मैनेज’ कराते हैं। कई ‘माननीयों’ के परिवारीजन तो कई के करीबियों ने ठेकेदारी में अपना ‘वर्चस्व’ कायम कर रखा है। आरईएस, लोक निर्माण, सिंचाई, जिला पंचायत, स्थानीय निकाय इत्यादि विभागों के टेंडर किसे मिलना है, यह ‘माननीय’ ही तय करते हैं। सबसे पहले माननीय अपने परिवारीजनों को उपकृत करते हैं। फि र उनके रिश्तेदारों का नंबर आता है। उसके बाद करीबियों में होड़ मचती है। इसके लिए बकायादा ‘कमीशन’ तय है। बात महज कमीशन से ही नहीं बनती, बल्कि ‘माननीय’ को खुश भी रखना पड़ता है। इसके लिए ठेकेदारों में होड़ लगी रहती है। टेंडर पाने के लिए ठेकेदार अपने को माननीय का खास बनाने की जुगत में उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। ‘माननीय’ किन चीजों का ‘शौक’ रखते हैं, इसकी मालुमात हासिल कर ठेकेदार उन्हें खुश करने के हर जतन करते हैं। जिससे सही मौका आने पर टेंडर उठाने को ‘माननीय’ की कृपा उन पर ही बरसे।