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न दूध न दवा, शिविर में बच्चे तक बेहाल

Varanasi Updated Sun, 18 Aug 2013 05:35 AM IST
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वाराणसी। अस्सी के गोयनका छात्रावास में बनाए गए बाढ़ राहत शिविर में शनिवार को खाना तक नहीं पहुंचा। यहां शरण लेने वाले ढाई सौ से अधिक लोगों को शाम तक भोजन का इंतजार था। नवजात शिशुओं से लेकर सालभर तक के कई बच्चे दूध के लिए रोते रहे। कुछ महिलाएं-बच्चे बीमार पड़ गए हैं। शिविर में दी जाने वाली दवा कारगर न होने पर बाजार से दवा खरीदनी पड़ रही है। प्रशासनिक उदासीनता से बाढ़ पीडि़तों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
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नगवां नाले के पास से विस्थापित हुई पूजा अपने 17 दिन के शिशु के साथ इस बाढ़ राहत शिविर में फर्श पर ही दिन बिता रही है। बच्चे को सर्दी ने जकड़ लिया है। बुखार भी आ रहा है। पूजा के मुताबिक वहां लगे मेडिकल कैंप में बच्चे की दवा नहीं है। इस वजह से उसे बाहर इलाज कराना पड़ रहा है। पूजा तो किसी तरह दिन बिता ले रही है लेकिन दूध न मिलने से बच्चे का पेट भरना मुश्किल हो गया है।
इसी तरह आठ दिन पहले नगवां से घर छोड़कर शिविर में आई पूनम के एक साल के बेटे गुनगुन को भी बुखार आ रहा है। वह भी चिकित्सक की सलाह पर 150 रुपये की दवा बाजार से लेकर आई है। रेखा भी अपनी पांच माह की पुत्री नैंसी को लेकर इस शिविर में शरण लिए हुए है। उसे भी बिटिया के लिए दूध की चिंता सता रही है। कुछ महिलाएं भी बीमार पड़ गई हैं। खांसी-दस्त से पीडि़त गुड्डन (26) रामनगर के लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में उपचार कराकर घर लौटी तो बाढ़ आ गई। इसके बाद हफ्ते भर पहले वह अपनी मां के साथ बाढ़ राहत शिविर में आ गई। अब यहां उसकी बीमारी फिर बढ़ गई है। न दवा मिल रही है न भोजन। अस्सी की रहने वाली कल्पना भी अपने दो मासूम बच्चों का किसी तरह यहां पेट भर रही है। शनिवार को शिविर में देर शाम तक लोगों को भोजन का इंतजार था। शिविर में रहने वाले सूरज के मुताबिक लेखपाल की ओर से खाना भेजने की सूचना कई बार आई लेकिन भोजन नहीं आया।
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कोट
शिविर में शरण लेने वाले लोगों के कितने बच्चे बीमार हैं और उनको किस तरह की बीमारी है, इसका पता लगाया जाएगा। जरूरत के लिहाज से मरीजों को दवा दी जाएगी। डॉ. एके पांडेय, चिकित्साधिकारी, बाढ़ राहत शिविर, गोयनका छात्रावास
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