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बंजर भूमि में लहलहाने लगीं फसलें

Varanasi Updated Wed, 04 Sep 2013 05:35 AM IST
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वाराणसी। कृषि मंत्रालय ने सोनभद्र और मिर्जापुर जिलाें के पिछड़े गांवाें के किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 2008 में राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना शुरू की थी। बीएचयू और भारतीय सब्जी अनुसंधान परिषद को इसे लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कृषि वैज्ञानिकों का प्रयास रंग लाया और बंजर भूमि में भी फसलें लहलहाने लगीं। 33 गांवों के 3600 किसानों की काया ही पलट गई। इनमें ज्यादातर आदिवासी हैं। इससे उत्साहित कृषि मंत्रालय ने परियोजना का दूसरा चरण भी शुरू कर दिया है। इसमें इन जिलाें के दस नए गांवाें को शामिल किया गया है।
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इस परियोजना में 2012 तक लगभग सात करोड़ रुपये खर्च हुए थे। मंत्रालय ने दूसरे चरण के लिए 139 लाख रुपये स्वीकृत किए हैं। यह परियोजना मार्च 2014 तक चलेगी। मंगलवार को बीएचयू के पीपीपी सेल में आयोजित प्रेसवार्ता में कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. रवि प्रताप सिंह ने परियोजना के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिर्जापुर और सोनभद्र के दस और गांवाें में किसानों को उन्नत प्रजातियाें के बीज एवं खेती के उन्नत तरीके के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इन गांवों में फसलों की सिंचाई के लिए एक चेक डैम बनाया जाएगा। किसानों को एक ट्रैक्टर भी दिया जाएगा। परियोजना के मुख्य वैज्ञानिक प्रो. साकेत कुशवाहा, प्रो. जेएस बोहरा, डा. नीरज सिंह ने बताया कि देश के 150 और पिछड़े जिलों में इस परियोजना को लागू करने के लिए कृषि मंत्रालय को सलाह दी जाएगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रभारी निदेशक प्रो. बी. सिंह ने बताया कि पिछले दो सालों के दौरान देश में सब्जी की खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल घटा है। इसका प्रमुख कारण किसानों में आई जागरूकता है।

कहां चलाई गई परियोजना
मिर्जापुर जिले के पड़री ब्लाक के 12 गांव तथा मडि़हान के 13 गांव परियोजना के लिए चयनित किए गए थे। इन्हीं ब्लाकों के छह नए गांवाें में अब परियोजना संचालित की जा रही है। सोनभद्र जिले के म्योरपुर ब्लाक के आठ गांव पहले परियोजना में शामिल किए गए थे। इस ब्लाक के चार और गांवाें में अब परियोजना चलाई जा रही है। परियोजना के दूसरे चरण में आठ सौ किसान शामिल हैं।
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कृषि वैज्ञानिकों ने क्या किया
बीएचयू और भारतीय सब्जी अनुसंधान परिषद के 31 वैज्ञानिकाें की टीम ने 2008 में मिर्जापुर और सोनभद्र के लगभग चार हजार हेक्टेअर असिंचित क्षेत्र को परियोजना के लिए चयनित किया था। सबसे पहले किसानों की आर्थिक स्थिति का सर्वे किया गया। उस समय एक किसान परिवार की सालाना आय लगभग 42 हजार रुपये थी। चयनित गांवाें में किसानाें का समूह बनाया गया। वैज्ञानिकों की टीम ने इस इलाके में जल संरक्षण के लिए बड़े-बडे तीन चेक डैम बनाए। इनके रखरखाव की जिम्मेदारी खुद किसानाें को सौंपी गई। चेक डैम में संचित पानी से फसलाें की सिंचाई की गई। खेतों की जुताई के लिए किसानों के समूहों को तीन ट्रैक्टर भी दिए गए। उन्नत किस्म के प्रजातियाें की खेती की गई। किसानों को तिलहन, दलहन, सब्जियों की खेती के अलावा पशुपालन, मुर्गी पालन, रेशम उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया गया। मार्च 2012 में फिर सर्वें हुआ तो पता चला कि एक किसान परिवार की सालाना आय बढ़कर 58 हजार रुपये हो गई है।
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