वाराणसी। संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान गुलाम दस्तगीर अब्बास अली विराजदार ने गुरुवार को संस्कृत और संस्कृति की विशिष्टता पर विस्तार से रोशनी डाली। संपूर्णानंद संस्कृत विश्व विद्यालय के योग साधना केंद्र में उन्होंने कहा कि वेद कल्पतरू हैं। जिस भावना से उनसे जो पाना चाहता है, वह उसको प्राप्त हो जाता है। आधुनिक पदार्थों से लेकर गूढ़ रहस्यों तक का विज्ञान वेदों में निहित है। संस्कृत को जाने बिना भारत को नहीं जाना जा सकता। इससे पहले उन्हें अंगवस्त्रम से सम्मानित किया गया।
योग साधना केंद्र के सभागार में उन्होंने कहा कि वेदों के अध्ययन से मुझे इसलाम को समझने की सामर्थ्य मिली। संस्कृत प्रत्येक अध्येता को उसके उपासना पंथ के बारे में ठीक तरीके से समझ बनाने में मददगार है। महर्षि अरविंद के वेद व्याख्यान और श्रीमां के उपदेशों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वेद ही भारत को उसकी मूल जीवन प्रणाली से जोड़ सकते हैं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय को उन्होंने संस्कृत की सेवा में लगे प्रत्येक व्यक्ति का गुरु स्थान बताया। दर्शन संकायाध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश नारायण त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं का मूल है। शब्दार्थ के लिए संस्कृत की व्यूत्प्ितत विधि और निर्वाचन प्रणाली को सभी भाषाएं स्वीकार करती हैं। बड़ोदरा से आए संस्कृत विद्वान संस्कृतानंद हरि और छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी ने भी विचार व्यक्त किए। स्वागत तुलनात्मक धर्म दर्शन विभाग के अध्यक्ष डॉ. रजनीश कुमार शुक्ल ने और संचालन डॉ. हरि प्रसाद अधिकारी ने किया। इस मौके पर प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रोत. राम पूजन पांडेय, प्रो. हर प्रसाद दीक्षित, डॉ. राजनाथ समेत कई आचार्य उपपस्थित थे।