वाराणसी। ‘एक ऐसा व्यक्ति जो खाना चखे बिना छिड़कता है नमक। एक ऐसा व्यक्ति नाटक को देखे बिना करता है उसकी समीक्षा।’ गौतम चटर्जी लिखित और सुमित श्रीवास्तव निर्देशित नाटक ‘कोरस’ का यह संवाद हमारे बौद्धिक संसार का सीटी स्कैन करके प्रस्तुत करता है। नाटक का मंचन नागरी नाटक मंडली प्रेक्षागृह में आश्विन नाट्य महोत्सव की पांचवीं शाम बुधवार को संस्कार भारती के बैनर तले किया गया। नाटक में प्रवृत्तियों के कोरस के माध्यम से समाज का पूरा व्यक्तित्व मंच पर उभर आया।
नाटक में चरित्र के बजाय प्रकृति, विघटन, मनोवृत्ति, द्वंद्व जैसे भावों का साकार रूप सबके सामने पेश किया गया। यह सब बिना कथानक के हुआ, जैसे कविताएं चल रही हों। मानो कोई व्यक्ति अपने अस्तित्व, अपनी व्यापकता की पड़ताल कर रहा। जैसे कोई अपने खोखलेपन के भीतर की पशु वृत्तियों के जरिए सभ्यता में घुलते जहर, प्रकृति के संग हो रही मनमानी को समझने की कोशिश कर रहा हो। बात शुरू हुई तो यहां तक पहुंची कि आज का आदमी पहले से ज्यादा विकसित, ज्यादा संघर्ष शील है। नाटक में आदर्शों और उनके खोखलेपन की भी पड़ताल की गई। निर्देशक ने इसके लिए ऐसी शैली इस्तेमाल कि चरित्र न रह जाए केवल विचार ही दर्शकों के साथ रहें। एकता गुप्ता, अमन जेटली, मुकेश तिवारी, आदित्य राज, श्याम नारायण, अनुराग सिंह, प्रशांत गुप्ता, प्रखर दूबे, प्रतीक महंत ने अभिनय से कोरस के लय और स्वर को संवारा। शैज खां का संगीत, अनूप मोतीलाल की रुपसज्जा, शैलेंद्र कुमार की लाइटिंग ने नाटक को प्रभावशाली बनाया।