वाराणसी। मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छा ओहदा, दस लाख सालाना से अधिक का पैकेज और शौक -जरूरत का हर साज-ओ-सामान...। आम तौर पर ऐसे लोग अब तक सियासत से दूर रहने में ही अपना भला मानते रहे हैं लेकिन अबकी बदलाव की हवा कुछ ऐसी चली है कि कई ऐसे लोग भी अपना लाखों का पैकेज छोड़कर सियासी डगर पकड़ ली है। वह भी सिर्फ इसलिए कि राजनीति में सकारात्मक बदलाव लाकर देश की व्यवस्था को बदलने में अपना कुछ सहयोग दे सकें। इस बार काशी में ऐसे सैकड़ों लोग चुनाव प्रचार और जनसंपर्क में कूदे हैं जिनको सियासत की एबीसीडी से मतलब नहीं, महज बदलाव की चाह है।
दिल्ली निवासी नंदन मिश्रा 20 लाख के पैकेज की अपनी जॉब छोड़कर देश वापस आ गए और सियासत में बदलाव की कोशिश में जुट गए। आईआईटी कानपुर से बीटेक करने के बाद उन्हें अमेरिका में सिटी बैंक में अच्छा ओहदा मिला लेकिन राजनीति के जरिये सिस्टम को दुरुस्त की चाह उन्हें यहां खींच लाई। उन्होंने नौकरी छोड़कर एक राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर ली। उनके लिए राजनीतिक पार्टी से जुड़ना बड़ी बात नहीं, वह खुश हैं कि राजनीति के जरिये चल रही बदलाव की कोशिशों में वह भी भागीदार हैं। ऐसे ही शशांक ने बंगलूरू स्थित मल्टीनेशनल कंपनी की अपनी जॉब छोड़ दी। एक पार्टी के समर्थन में इन दिनों यहां डेरा डाले हुए हैं। वह कहते हैं कि उनका उद्देश्य राजनीति नहीं बल्कि इसके जरिये व्यवस्था में बदलाव का है। कर्नाटक टुंकुर से आईं रेणुका कहती हैं कि उन्हें राजनीति में कभी रुचि ही नहीं थी लेकिन देश में भ्रष्टाचार की नींव इस कदर मजबूत है कि उसे खत्म करने के लिए उन्हें यह राह चुननी पड़ी। एक वेब कंपनी में बतौर एमडी वो कार्य कर रही थीं। ऐसे ही गुजरात से विपिन पटेल अपना अच्छा खासा बिजनेस छोड़कर काशी की गलियों में एक राजनीतिक पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। उन्हें पार्टी में सच्चाई दिखी, मुद्दे अच्छे लगे। वह जुड़ गए।
पार्टीगत राजनीति से अलग हटकर देखें तो लोकतंत्र के लिए यह एक शुभ संकेत है। अब तक नदी के पानी को ‘दूषित’ बताकर किनारे किनारे चलने वाले ऐसे लोगों ने धार से लड़कर पार जाने की ठान ली है। एक दो नहीं, सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो इस दफा अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़कर राजनीति में सकारात्मक बदलाव की कोशिश में जुटे हैं। वो भले ही एक पार्टी या प्रत्याशी विशेष के पक्ष में खड़े हैं लेकिन इस नई सोच को आगामी बदलाव की नींव तो मानी ही जा सकती है।
पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक दलों के क्रियाकलापों के कारण आम जनता में राजनीति के प्रति उदासीनता आ गई थी। भ्रष्टाचार महंगाई से हर कोई ऊब चुका है। अन्ना के आंदोलन से उन्हें एक विकल्प मिला। खास तौर से युवाओं को एक रोशनी नजर आई। उन्हें वैकल्पिक राजनीति का मौका मिला। इसे शुभ संकेत कहा जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि युवाओं की इस तरह की भागीदारी देश की दिशा बदल सकती हैं।
प्रो. जयकांत तिवारी, समाजशास्त्री, बीएचयू