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प्रदूषण के ‘करोना’ से सूरज का ‘हैलो’

Varanasi Updated Mon, 21 Apr 2014 05:31 AM IST
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वाराणसी। बनारस में बढ़ते प्रदूषण ने रविवार को सूरज को भी घेर लिया। सुबह दस बजे से दोपहर 12 बजे तक धूल के वलय से घिरे सूरज को देखकर लोगों में कौतूहल भले ही रहा हो लेकिन मौसम विज्ञानी इसे शहर में बढ़ते प्रदूषण के खतरे से जोड़ कर देख रहे हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार सूरज को घेरने वाले इस धूल वलय को करोना और हैलो के नाम से जाना जाता है। यह सामान्य घटनाक्रम है लेकिन रविवार को जिस प्रकार का घना धूल वलय बना वह खतरे का संकेत है। यह शहर के वातावरण में बढ़ते प्रदूषण का संकेत है और इससे जल्द से जल्द निजात पाना होगा।
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बताते चलें पिछले दो सालों में वाराणसी में धूल की मात्रा सामान्य मानक से तीन गुना अधिक मापी जा रही है। धूल कणों की बढ़ी मात्रा के कारण ही रविवार को सूरज का करोना बना। करोना देखने के बाद लोगों में इसे लेकर कौतूहल रहा। कोई खगोलीय घटना मान रहा था तो कोई बड़ा अपशकुन। हालांकि मौसम विज्ञानियों ने इस सामान्य घटना बताया। उनका कहना था कि यह खगोलीय घटना नहीं है। हां, घना वलय बनना जरूर चिंता का विषय है और हमें पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभानी होगी।

तीन साल में तीन गुना बढ़े सांस के मरीज
वाराणसी। शहर में तीन साल से चल रही खुदाई के चलते उड़ने वाली धूल ने शहर में सांस के रोगियों की संख्या तकरीबन तीन गुना तक बढ़ा दी है। धूल के गुबार की वजह से लोगों के फेफड़े कमजोर हो रहे हैं। नौबत यहां तक पहुंच गई है कि लोग मास्क पहनकर घर से निकलने को मजबूर है। बीएछ?ऊ आईएमएस के छाती रोग विभाग के प्रो. एसके अग्रवाल का कहना है कि यह देखने में आ रहा है कि लोगों का फेफड़ा कमजोर हो रहा है। सर सुंदरलाल चिकित्सालय में तीन साल पहले सांस के 50-60 मरीज आते थे जबकि अब 150-200 रोगी आ रहे। इसके लिए धूल के साथ डीजल, पेट्रोल, धुआं भी कारक हैं। शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय के बहिरंग विभाग में रोजाना 20-30 मरीज आते हैं जबकि पांच-छह रोगी गंभीर स्थितियों में भर्ती होते हैं। पिछले साल ओपीडी में नौ हजार से ज्यादा श्वांस रोगियों की परीक्षण किया गया। निजी चिकित्सालयों का भी हाल कुछ ऐसा ही है। बाल रोग विशेषज्ञ डा. अशोक राय का कहना है कि धूल, धुएं की वजह से कम उम्र में भी दमा और एलर्जी की शिकायतें आ रही हैं। पहले की तुलना में अब ऐसे बाल रोगियों की संख्या में 30 फीसदी तक का इजाफा हुआ है।
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धूल पर ‘पानी’ डालने की व्यवस्था नहीं
वाराणसी। तीन सालों में सीवर, पेयजल की योजनाओं में 600 किमी से अधिक पाइप लाइन डालने के लिए शहर में खुदाई होती रही। धूल के गुबार उड़ते रहे। लोग बीमार होते रहे। नियम के बाद भी धूल दबाने के लिए पानी के छिड़काव की कोई व्यवस्था नहीं की गई। खुदाई के बाद सड़क भी बनी लेकिन कार्यदायी संस्थाओं ने धूल सड़क किनारे ही छोड़ दी। वाहनों के आवागमन से उड़ रही धूल राहगीर फांकने को मजबूर हैं।

पेड़ कम हुए तो बढ़ती है धूल
पेड़ों की संख्या कम होने पर भी वातावरण में धूल बढ़ती है। पिछले वर्ष वन विभाग ने कुल छह सौ पौधे ही लगाए थे। जबकि निर्माण कार्य के चलते कटने वाले पेड़ों की संख्या हजारों में रही।

वैसे तो यह सामान्य घटना है लेकिन इतना घना करोना बढ़ते प्रदूषण को दर्शाता है। ऐसी घटना साल में दस बार भी हो सकती है और दस साल में एक बार भी नहीं। यह वायुमंडल में बढ़े प्रदूषण के कारण होता है।
प्रो. बीआरडी गुप्ता
मौसम विज्ञानी बीएचयू

धूल पर नियंत्रण के लिए कार्यदायी संस्थाओं को पानी का छिड़काव करना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में संबंधित विभागों को पत्र लिखा गया है।
यूके त्रिपाठी, नगर आयुक्त

बढ़ते प्रदूषण के कारण करोना बनना चिंता की बात है। प्रदूषण न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे।
प्रांजल यादव
जिलाधिकारी
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