वाराणसी। मनुष्य का इतिहास ही विस्थापन से भरा है। इसी से पूरी दुनिया बनी है और नई संस्कृतियों का उदय होता है। ये बातें कवि अरुण कमल ने मंगलवार को गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान की ओर से होटल ताज में विस्थापन और भोजपुरी लोक परंपरा पर आयोजित संगोष्ठी में कहीं। संगोष्ठी दो दिनों तक चलेगी। बुधवार को दूसरे दिन के सत्र बीएचयू के विधि संकाय में होंगे।
विस्थापन और संस्कृति विषयक सत्र की अध्यक्षता करे अरुण कमल ने कहा कि एक से दूसरे स्थान पर जाने पर मनुष्य अपनी संस्कृति से कुछ खोता है और वहां की संस्कृति से सीखता भी है। यही बनने की प्रक्रिया है। सभ्यताओं के बनने और मिटने में इसकी बड़ी भूमिका रही है। इस प्रक्रिया में लोगों को दुख सहना पड़ता है जो सांस्कृतिक रूप में अभिव्यक्त होता है। इसी से नित नई संस्कृतियों का जन्म होता रहता है। चर्चा में हिस्सा लेते हुए तैयब हुसैन ने कहा कि भिखारी ठाकुर ने अपने विदेशिया नाटक में माइग्रेशन की पीड़ा का सटीक वर्णन किया है। रोजी-रोजगार की तलाश में अन्यत्र गए लोगों की पीड़ा को उन्होंने बड़े ही मार्मिक ढंग से पेश किया है।
इससे पूर्व उद्घाटन सत्र में कवि प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि औपनिवेशिक काल से शुरू हुआ माइग्रेशन का सिलसिला वैश्वीकरण के दौर में और तेज हो गया है। जब किसी समाज के लोग माइग्रेट करते हैं तो अपने साथ अपनी संस्कृति भी ले जाते हैं लेकिन कालांतर में उनकी भाषा खत्म होती जाती है और अपनी जड़ के बारे में नई स्मृति पैदा होती है। उनके पास धन और संपदा सब कुछ होता है लेकिन खोने का एहसास भी गहरा होता है। इस कमी को लोग अपनी संस्कृति से पूरा करना चाहते हैं। मारीशस, ट्रीनिदाद आदि देशों में बसे भारतीय अपनी जड़ें तलाशने में लगे हैं लेकिन उनकी भाषा बदल गई है। उनके यहां सत्यनारायण की कथा अंग्रेजी में होती है। भाषा के इस अभाव चलते वहां के लोग सांस्कृतिक विक्षोभ का जीवन जी रहे हैं। सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. चौथीराम यादव ने कहा कि मजदूर जब काम की तलाश में दूसरी जगह जाते हैं तो अपनी सांस्कृतिक परंपरा से और गहराई से जुड़ जाते हैं। इसी के जरिए वे भावनात्मक संबल पाते हैं। संचालन प्रो. बद्रीनारायण और धन्यवाद ज्ञापन प्रदीप भार्गव ने किया। हरिराम द्विवेदी, विष्णु महापात्रा, मन्नू यादव, तारकेश्वर मिश्र राही, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, डा. कृष्ण मोहन, डा. आशीष त्रिपाठी आदि ने चर्चाओं में भाग लिया।