वाराणसी। हज की नियत कर वाराणसी से हजयात्रियों का कारवां मदीना शरीफ पहुंच गया है। मदीना की सरजमीं पर पहुंचने वाले जाइरीन उमरा और हज के अरकानों में भी अकीदत के लग चुके हैं और उनकी इस अकीदत और अरकानों को पूरा करते हुए उनके अपने भी घर बैठे देख रहे हैं। सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के जरिए हज जाइरीन अपनों से लगातार जुड़े हुए हैं। मदीना और काबा के दिलकश नजारों की फोटो और वीडियो को वाट्स एप और फेसबुक के जरिए वो अपनों के साथ शेयर कर रहे हैं। ककरमत्ता से इस बार अफजाल खां अपने अब्बू के साथ हज पर गए हैं। उनका पूरा परिवार यहीं है लेकिन वो लगातार एक दूसरे से जुड़े हैं। मक्का और मदीना की मस्जिदों का दिलकश मंजर, खाना-ए-काबा, मैदान-ए-अराफात, मिना आदि जगहों की फोटो वो वाट्स एप के माध्यम से भेज रहे हैं। कई लोगों ने फेसबुक पर भी मदीना व काबा में हज के अरकान अदा करते हुए फोटो व वीडियो को शेयर किया है।
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चार अक्तूबर से शुरू होंगे हज के अहम अरकान
अमर उजाला ब्यूरो
वाराणसी। बकरीद छह अक्तूबर को मनाई जाएगी। कुरबानी के इस पर्व के दो दिन पहले हज के अहम अरकानों का दौर भी शुरू हो जाएगा। बकरीद के दो दिन पहले शुरू होने ये अरकान सात दिनों तक बेहद अहम होते हैं। जिलहिज्जा की आठवीं तारीख को सबसे पहले हज जायरीन मिना के लिए रवाना होते हैं। यहीं पर जोहर से लेकर दूसरे दिन की सुबह की नमाज (फजिर) अदा की जाती है। दूसरे दिन जाइरीनों को मैदान-ए-अराफात जाकर मसजिद नबवीं में ठहरना है। यहां नमाजें अदा करनी हैं, खुत्बा सुनना है। सूरज डूबने तक रो-रोकर अपने गुनाहों से तौबा करना है। हज का सबसे अहम अरकान यही है। तीसरा दिन यानी बकरीद का दिन। इस दिन सूरज निकलने के बाद तीन शैतानों को पत्थर मारना होता है। इसके बाद कुरबानी कराना होता है। इसके बाद सिर के बाल छिलवाना है और फिर खाना काबा का तवाफ करना। ये चारों काम सबसे अहम है। चौथे दिन एक बार फिर से तीनों शैतानों को सात-सात पत्थर मारना होता है। वहीं पांचवें दिन भी इसी तरह तीनों शैतानों को पत्थर मारना है और सूरज डूबने से पहले मैदान-ए-अराफात से वापस मिना चले आना होता है। छठवें दिन भी शैतानों को पत्थर मारना है। इसके साथ ही हज पूरा हो जाएगा। अब यहां से हाजियों को वापस लौटना है।