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अर्थ-विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत

Varanasi Updated Mon, 10 Nov 2014 05:30 AM IST
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वाराणसी। आरएसएस के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि अगर हमें औपनिवेशिक दुष्प्रभाव से उबरना है तो अपनी अर्थनीति, विदेश नीति, राजनीति और समाजनीति को भारतीय परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से परिभाषित करना होगा। कहा, व्यापक चिंतन करके ऐसे विकल्प तैयार किए जाएं जिससे कि इस प्रतियोगिता के युग में देश को विकास के पथ पर आगे ले जाया जा सके। ये बातें उन्होंने रविवार को प्रज्ञा प्रवाह की ओर से आयोजित ‘औपनिवेशिक मानसिकता के दुष्प्रभाव से मुक्ति एवं नव उदारवाद की चुनौतियां’ विषयक दो दिनी परिचर्चा के आखिरी सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहीं।
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दोपहर बाद दुर्गाकुंड स्थित धर्मसंघ के सभागार में हुई इस परिचर्चा में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने दो भागों में बंटे समाज के अंतर को परिभषित किया। कहा कि भारत के विश्वविद्यालयों की तरह ही पश्चिम के विश्वविद्यालयों में भी समाज शास्त्र पढ़ाया जाता है लेकिन पश्चिमी सोच और देसज वर्ग के बीच बौद्धिक वर्ग बंट गया है। ऐेसे में उपनिवेशवाद से मुक्ति बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद को भारतीय परिवेश, परंपरा और परिवार को ध्वस्त करने का तंत्र नहीं बनने देना चाहिए। इस मौके पर रमाशीष, रामगोपाल, डॉ. नंदू सिंह, डॉ. सुशील त्रिपाठी, डॉ. अनिल सिंह, नागेंद्र कुमार सिंह, कृष्ण मोहन, ओमप्रकाश आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति डा. पृथ्वीश नाग ने की। संचालन प्रोफेसर रजनीश शुक्ल ने और संयोजन प्रो. आद्या प्रसाद पांडेय ने किया।
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