डा. सुरेंद्र प्रताप सिंह
वाराणसी। समाजवाद की पहचान सिर्फ पुस्तकों से संभव नहीं, उसे पुस्तकों के साथ-साथ गहरे तथा लंबे संघर्षों से समझा जा सकता है। बनारस की धरती समाजवादी आंदोलन की प्रमुख धुरी रही है। डा. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, जय प्रकाश नारायण, संपूर्णानंद के साथ-साथ प्रभु नारायण सिंह का नाम जोड़ देने से समाजवाद की एक बड़ी तस्वीर उभरती है। इन बड़े और महान समाजवादी नेताओं के अतिरिक्त प्रभु नारायण जी ने समाजवादी आंदोलन को संघर्षों का नया तेवर, नई धार और नई संवेदना दी। वह देश के प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक, विचारक, लेखक और राजनेता रहे हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा 1930 से 2000 तक असाधारण तथा सात दशकों की लंबी और अंतहीन यात्रा रही। आज विचारहीनता के इस दौर में समाजवादी विचारधारा की प्रासंगिकता बढ़ी है। इन्हीं संदर्भों में प्रभु नारायण जी के विचार और चिंतन भी प्रासंगिक हैं।
बीएचयू अपने स्थापना से ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की अनेकानेक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। यहीं छात्र राजनीति में वे गांधी और लोहिया से प्रभावित हुए। बीएचयू में गांधीवाद, समाजवाद के साथ-साथ उन्होंने संघर्ष का संस्कार ग्रहण किया। उन्होंने विश्वविद्यालय संग्राम समिति की स्थापना की और बीएचयू को सोशलिस्ट रिपब्लिक आफ इंडिया घोषित किया। इस प्रकार छात्रों के माध्यम से पूरे भारत में भारत छोड़ो आंदोलन फैला। जेल में उन्होंने मार्क्स के दास कैपिटल और थियरी आफ सरप्लस वैल्यू के साथ-साथ गांधीवाद और समाजवाद का भी गहन अध्ययन किया। बाहर आने के बाद वे परिपक्व समाजवादी बने। 1945 के बाद जवाहर लाल नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव की तुलना में डा. लोहिया के तीखे और क्रांतिकारी विचारों ने उन्हें अधिक प्रभावित किया, जिस कारण वे लोहिया की ओर आकर्षित हुए। 1960 में किसान-मजदूर आंदोलन की अगुवाई करने के कारण लोकसभा का सदस्य रहते हुए भी उन्हें निवारक नजरबंदी कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। डा. लोहिया के बाद राजनारायण को छोड़ सर्वाधिक गिरफ्तारी देने वालों में प्रभु नारायण जी रहे हैं।
उनके जीवन का एक बड़ा सपना था पूर्वांचल राज्य का गठन। 1995 से 2002 तक पूर्वांचल राज्य बनाओ मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में भी वह सक्रिय रहे। मुलायम सिंह को छोड़कर आज कोई ऐसा समाजवादी नेता नहीं है जो समाजवादियों को एकजुट कर नई दिशा दे पाने में सक्षम हो। आज देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की संभावनाएं बढ़ी हैं। समाजवादियों, प्रगतिशीलों को एकजुट कर डा. लोहिया की राह पर तीसरे मोर्चे का सृजन जहां अपेक्षित है, प्रभु नारायण सिंह जैसे समाजवादी नेता और चिंतक का जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।