वाराणसी। बढ़ते उपभोक्तावाद के कारण पाश्चात्य सभ्यता हावी होती जा रही है, जो चिंता का विषय है। लोग आवश्यकता और लालच के बीच सामंजस्य बैठाने में विफल हो रहे हैं। शनिवार को बीएचयू के राजनीति विज्ञान विभाग में गांधी चिंतन की प्रासंगिकता विषयक विशेष व्याख्यान में पूर्व कुलपति और प्रख्यात गांधीवादी चिंतक डा. रामजी सिंह ने ये बातें कहीं।
उन्हाेंने हिंदी की हिमायत करते हुए कहा कि अन्य भाषाआें से गांधी जी की ही तरह मुझे दुराव नहीं है। उन्हाेंने पश्चिमी सभ्यता के मापदंड बदलने की वकालत करते हुए कहा कि अहिंसक जन आंदोलन हिंसा से ज्यादा सशक्त है। विषय स्थापना और स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. आरपी पाठक ने की। सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष प्रो. चंद्रकला पाडिया ने कहा कि गांधी दर्शन की सार्थकता उसे पढ़ने से ज्यादा अमल में लाने से होगी। इसमें प्रो. आनंद शंकर सिंह, डा. घनश्याम, प्रो. बिंदा परांजय, प्रो. संजय श्रीवास्तव, प्रो. एएन मोहंती, प्रो. शुभा राव, प्रो. टीपी सिंह आदि ने विचार व्यक्त किए।