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डिजिटल युग की हकीकत ‘सारांश’ नहीं ‘मर्डर’

Varanasi Updated Sat, 23 Feb 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। सोवियत संघ के बिखरने के बाद से बाजार हर चीज की तरह सिनेमा को भी तय कर रहा है। बाक्स आफिस के कलेक्शन का नंबर क्रिएटिविटी तय कर रही है। प्रसिद्ध फिल्मकार महेश भट्ट मानते हैं कि ऐसे समय में सारांश और अर्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण मर्डर हो गया है। स्टीव जाब्स ने भारत आकर निर्वाण और मोक्ष को समझा, फिर अमेरिका लौटने के बाद एप्पल का साम्राज्य खड़ा कर दिया। आज भगवान को भी युद्ध का उपकरण बनाया जा रहा है। वह शुक्रवार को स्कूल आफ मैनेजमेंट साइंसेज के कार्यक्रम भाग लेने आए थे।
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उन्होंने बताया कि नक्सल समस्या पर वृत्तचित्र बनाने वह बस्तर गए थे। नदी पार करते समय नाविक से पूछा कि कितना कमाते हो। उसने कहा कि लोगों को पार कराता हूं, बदले में लोग एक-दो रुपये दे देते हैं। इतने से काम चल जाता है। कुछ दूरी पर एक निर्माणाधीन पुल दिखा। उसे दिखा कर पूछा कि पुल बनने के बाद तुम्हारा क्या होगा। उसने जवाब दिया, हमारा जो होगा सो होगा, लोगों का तो अच्छा होगा ना। नाविक के भीतर जो चीज दिखी थी, वह अब मर रही है। आज सब बाजार में हैं। कोई साल्वेशन बेच रहा है, कोई साबुन। सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया तेजी से बदली है। उदारवाद का बाजार हर चीज को अपने दायरे में ले रहा है। सलमान खान की फिल्में करोड़ों का कारोबार करती तो हैं क्रिटिक भी सराहना करना लगते हैं। पैसा क्रिएटिविटी का पैरामीटर हो गया है। डिजिटल टेक्नालाजी के प्रसार ने फिल्म देखने वाले युवाओं का मानदंड बदला है। अर्थ और सारांश फिल्मकार की कल्पना की रचना थीं। आज बाजार को देखते हुए जन्नत, राज और मर्डर बनानी पड़ी। उन्होंने बताया कि आशिकी की सिक्वल बन कर तैयार है, जो मई में रिलीज होगी। अब अपनी इच्छा और बाजार की मांग दोनों के अनुरूप अलग-अलग फिल्में बनाऊंगा।
श्री भट्ट ने कहा कि बनारस में अतीत की गूंज है। एक फिल्म लिखी जा रही है, जिसका नायक आध्यात्मिक परिवार से जुड़ा है। वह मुंबई पहुंच कर मनोरंजन की दुनिया में जगह बनाता है। इसको बनारस में शूट करने का इरादा है। जेनेटिकली माडिफाइड फूड पर आधारित वृत्त चित्र प्वाइजन आफ प्लेटर के मुद्दे को भी आगे बढ़ाना है। उसे अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में बदलने की कोशिश चल रही है। इसके साथ ही वह अपनी जिंदगी के सफर पर कहानी लिख रहे हैं।
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