इस बार तो मैं यह सोच कर काशी आया था कि पंडित वीरभद्र जी से मिल कर उलाहना दूंगा कि बहुत दिनों से मंदिर में मुझे भजन गाने का मौका नहीं दिया। बुधवार की सुबह मुंबई में हवाई जहाज पर बैठते वक्त सोच रहा था कि बनारस से प्रयाग जाने से पूर्व संकटमोचन मंदिर में दर्शन करके महंत जी से सामवेद के पद्यानुवाद के संदर्भ में चरचा करूंगा। शाम सवा चार बजे पहुंचा तो मंदिर के द्वार पर कुछ अलग अनुभूति हुई। पूछा तो ज्ञात हुआ कि महंत जी का तिरोधान हो गया। उनसे मेरी पहली मुलाकात करीब 17 साल पहले हुई थी। उसके बाद तो कोई ऐसी काशी यात्रा नहीं थी जब संकटमोचन और महंत जी के दर्शन किए बगैर लौट गया हूं। पिछली बार जब उनसे मिलने पहुंचा तो वह गायन का अभ्यास कर रहे थे। पं. छन्नूलाल मिश्र उन्हें सिखा रहे थे। उम्र के इस पड़ाव पर सीखने की ललक मेरे लिए प्रेरणा स्रेात बन गई। मैं संकटमोचन मंदिर को वीरभद्र जी के माध्यम से ही जानता हूं। हनुमान जी के सच्चे सेवक की विदाई हुई है उन्हें प्रभु चरणों में ही स्थान मिलेगा।
- रवींद्र जैन, संगीतकार
एक घंटे में समझाया था मानस का तत्व
बात वर्ष 2003 की है। संकटमोचन मंदिर में मैं अपने पति तरुण भट्टाचार्य के साथ पं. वीरभद्र मिश्र से मिलने पहुंची थी। उन्होंने हमें स्वयं मंदिर के एक-एक स्थान की महत्ता बताई थी। इसके बाद उनके कक्ष में एक घंटे तक बातचीत हुई। उस एक घंटे में तुलसी दास और रामचरित मानस के बारे में ही चर्चा हुई। इतने अल्प समय में उन्होंने बड़ी सरलता के साथ मानस का तत्व समझा दिया था। तुलसी घाट के उस कक्ष को जिसमें तुलसी बाबा रहा करते थे पंडित जी के साथ देखना मेरे जीवन का अविस्मरणीय क्षण है। अगले वर्ष उन्होंने मुझे संकटमोचन संगीत समारोह में ओडिसी प्रस्तुत करने का अवसर दिया। फिर तो उनसे कई यादगार मुलाकातें हुईं। उनसे मिल कर लगता था जैसे एक संत आत्मा और बहुत ही पहुंचे हुए ज्ञानी भक्त से भेंट हुई हो।
- संचिता भट्टाचार्य, ओडिसी नृत्यांगना, कोलकाता
82 में आशीर्वाद दिया, 97 में हुआ फलित
1982 में मैं काशी में पं. रविशंकर के यहां रहकर संगीत की शिक्षा अर्जित कर रहा था। तब मैं गुरु जी के साथ ही संकटमोचन मंदिर गया था। वहां पं. रविशंकर और पं. वीरभद्र मिश्र जी के बीच पखावज पर गंभीर चरचा हुई थी। मंदिर जाने से पहले गुरु जी ने मुझे बताया था कि महंत जी पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन उनकी बातें सुनने के बाद तो मुझे लग रहा था कि मैं दो संगीतविदों की चरचा सुन रहा हूं। गुरु जी ने चलते-चलते उनसे मेरा परिचय कराया था। तब प्रो. वीरभद्र जी ने कहा था कि जल्दी से इस लायक बजाना सीखो की तुम्हें भी संकटमोचन के मंच पर स्थान मिल सके। तुम पंडित जी के शिष्य हो ऐसा जरूर करोगे। 15 वर्ष बाद 1997 में उनका आशीर्वाद फला और में संकटमोचन के मंच तक पहुंचा।
- पं. तरुण भट्टाचार्य, संतूर वादक, कोलकाता