वाराणसी। रसिकों के शहर बनारस में होली के बाद मनने वाले उत्सव बुढ़वा मंगल की दो अलग-अलग महफिलें सजेंगी। बनारस के रईस लकदक कुर्ता-पायजामा में अलग ठाट और शानो-शौकत पेश करेंगे तो प्रशासन अलग। इस बार रईसों का बजड़ा पहले सजेगा। दो अप्रैल की शाम पक्के महाल के रईसों का बजड़ा देश-दुनिया के पर्यटकों और संगीत प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।
काशी में 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मीर रुस्तम अली ने जिस बुढ़वा मंगल के उत्सव की नींव डाली थी, उसे जिंदा रखने और बढ़ाने को जतन कम नहीं हुए हैं। इस बार बजड़ों में पुछिल्ला बांधकर विंध्याचल तक महफिल का रंग जमाने की योजना थी लेकिन अपरिहार्य कारणों से बुढ़वा मंगल पर सजने वाला रईसों का बजड़ा दादरा, ठुमरी, चैती की मिठास लिए कुछ घाटों पर ही इतराएगा। इस आयोजन की अगुवाई करने वाले पक्के महाल के रमन शंकर पंड्या उर्फ रम्मू भैया के मुताबिक, तीन बजड़े सजेंगे। मीरघाट से बजड़ों पर सजी महफिल की शुरुआत प्रसिद्ध ठुमरी गायिका सुचरिता गुप्ता करेंगी। राजेश्वर आचार्य का भी गायन होगा। भोजपुरी के जानेमाने गीतकार पं. हरिराम द्विवेदी की मौजूदगी में कवि गोष्ठी भी इस उत्सव का एक हिस्सा बनेगी। इसके अलावा, चैती का समूह गान भी आकर्षण का केंद्र रहेगा। गुलाब की पंखुडि़यां स्वागत में उड़ाई जाएंगी। लकदक कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनकर घर-घर से रईस बजड़े की सवारी के लिए निकलेंगे। ठंडई की मस्ती रहेगी अलग से।