गजरौला। लोगों में वास्तव में जागरूकता की कमी है। समाजसेवी संस्थाओं के तमाम नारे, मीडिया के अनुरोध और साधु-संतों के आंदोलनों के बावजूद गंगा को प्रदूषण से मुक्ति नहीं मिल पा रही है। कार्तिक पूर्णिमा के स्नान पर गंगाधाम तिगरी में उमड़ी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ गंगा में कूड़ा-कचरा डालकर अपने घरों को लौट गई है। अपने पाप धोकर गंगा को मैली करने वालों की करतूत से गंगा उदास है।
हर बार की तरह इस बार भी लाखों की भीड़ तिगरी में गंगा स्नान को आई। गंगा को मोक्ष दायिनी, पतित पाविनी का दर्जा देने वालों ने ही इसे मैला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब मेला उखड़ चुका है और रेला लौट चुका है लेकिन गंदगी के अवशेष गंगा में ही छोड़ दिए हैं। गंगा का पानी दूर-दूर तक मैले-कचरे से अटा पड़ा है। फूल, घास-फूंस, झूठी पत्तलें, टूटी क्राकरी, गुटखे, बीड़ी, सिगरेट, फटे हुए जूते-चप्पल, कपड़े, पालीथिन, हवन सामग्री, राख, माचिस की तीलियां आदि तमाम वस्तुओं से गंगातट पर गंदगी पसरी हुई है। यहां का नजारा देखकर विश्वास ही नहीं होता कि मनुष्य इतना संस्कारहीन हो गया है। गंगा को मैला करने में शायद ही किसी ने कसर छोड़ी हो। वास्तव में स्वार्थ में अंधे हो चुके इंसान को यह एहसास तक नहीं है कि उनके इस कृत्य से मां स्वरूप माने जाने वाली गंगा कितनी उदास है। लेकिन, क्या करें... मां है ना।