गरुड़। आपदाग्रस्त पप्या गांव के 106 परिवार के 896 सदस्यों की आसमान में हल्के बादल देखकर रूह कांप जाती है। हल्की बारिश में गांव के प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूल की छुट्टी कर दी जाती है। आपदा का दंश झेल रहे अधिकांश परिवारों ने भूस्खलन के भय से अपने जेवरात, बैंक पासबुक और अन्य अभिलेख रिश्तेदारों के यहां सुरक्षित पहुंचा दिए हैं। बारिश में तल्ला और मल्ला पप्या के ग्रामीण झुंड बनाकर रह रहे हैं।
पप्या गांव चमोली और बागेश्वर जिले का सीमावर्ती गांव है। गांव के ऊ परी हिस्से में बहुत बड़ी पहाड़ी है। हिमालयी क्षेत्र से सटे होने के कारण गांव में कुछ ज्यादा ही बारिश होती है। 1986 में पहाड़ी में भारी भूस्खलन हुआ था। तब भूस्खलन की रोकथाम के लिए कृषि विभाग ने पहाड़ी के ऊ परी हिस्से में जल निकास नाली बनाई थी। तब जिला प्रशासन अल्मोड़ा ने गांव को भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील घोषित किया था। विस्थापन की फाइल पहले अविभाजित उप्र अब उत्तराख्ंाड शासन में लंबित पड़ी है। हालांकि शासन ने तब आपदा से बचने के लिए हरीनगरी गांव में भूंकपरोधी दस टिन शेडों का निर्माण भी किया। जिनकी दूरी गांव से 6 किमी है। जहां पहुंचने में ग्रामीणों का पौन घंटे का पैदल सफर करना पड़ता है। गांव की बुजर्ग महिला कलावती देवी ने बताया कि हमें अब विश्वास नहीं है कि सरकार गांव को विस्थापित करेगी। गांव के पूर्व प्रधान गोपाल सिंह परिहार ने बताया कि विस्थापन की फाइल 28 साल से शासन में धूल फांक रही है। गांव की प्रधान कमला देवी ने बताया किआपदा के मद्देनजर शिक्षा विभाग ने मल्ला पप्या के प्राथमिक विद्यालय को दो साल पूर्व तल्ला पप्या प्राथमिक में शिफ्ट कर दिया था। उन्होंने बताया कि स्कूल दूर होने से बच्चे शिक्षा लेने वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं।