भीमताल। प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में संगीत प्रेमियों में शास्त्रीय संगीत के प्रति रुझान बढ़ा है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच हमें अपनी संस्कृति और लोक संगीत को बचाने के लिए जागरूक होना होगा, तभी भावी पीढ़ी अपनी संस्कृति के बारे में जान पाएगी।
श्रीमती मुदगल बुधवार को यहां नौकुचियाताल रोड स्थित अपने आवास में अमर उजाला से बातचीत कर रही थीं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि माता-पिता दोनों ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कार्यरत थे और दोनों की ही संगीत में विशेष रुचि थी। इसी के चलते संगीत से उनका बचपन से नाता रहा। इलाहाबाद में पंडित रामाश्रय झा से उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह दिल्ली आ गईं और आठ साल तक पंडित विनय चंद्र मुदगली और नैना देवी से ठुमरी और दादरा की शिक्षा ली। धीरे-धीरे शास्त्रीय संगीत को ही कैरियर बना लिया। उन्होंने बताया कि फिल्मों में गायन से उनका विशेष नाता नहीं है। अलबत्ता शास्त्रीय गीतों से संबंधित उनकी सैकड़ों एलबम अब तक निकल चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले जारी एलबम अबके सावन का गीत अबके सावन ऐसे बरसे और एलबम प्यार का गीत का रंगीलो म्हारो ढोलना गीत लोगों ने खूब पसंद किया है।
उन्होंने बताया कि एनडीएमसी और स्पिक मैके संस्था दोनों ही शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों को जागरूक करने की दिशा में बेहतर कार्य कर रही हैं। इसके अलावा एनडीएमसी दिल्ली में म्यूजिक इन द पार्क नाम से विभिन्न पार्कों में संगीत का आयोजन करती है जहां लोगों को नि:शुल्क संगीत सुनने को मिलता है। वह स्वयं छह सात बार म्यूजिक इन द पार्क कार्यक्रम में प्रतिभाग कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि संगीत हो या फिर संस्कृति उसे बचाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए। श्रीमती मुदगल ने लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए रामलीला जैसे आयोजनों को बेहद कारगर बताया।