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गौला पुल ने कर दी जेब ढीली

Nainital Updated Sat, 03 Aug 2013 05:35 AM IST
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हल्द्वानी। गौला पुल धराशायी होने पर भले दोषी अधिकारियों का कुछ न बिगड़ा हो, पर पुल गिरने और तय समय सीमा के बाद भी नहीं बनने से लोगों की जेब जरूर ढीली हुई है। समय जो लगा, वह अलग से है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पुल गिरने के कारण गौलापार, हल्द्वानी के लोगों को करीब 14 लाख किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ा है। करोड़ों रुपये का पेट्रोल भी इसमें फुंका है।
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गौला पुल 2008 में धराशायी हो गया। इसके बाद लोनिवि ने पुल का निर्माण का काम शुरू किया। पांच साल से ज्यादा का वक्त हो गया है, पर पुल से वाहनों का संचालन शुरू नहीं हुआ है। बस तारीख पर तारीख दी जा रही है। पुल गिरने के बाद जंगलात ने लोगों की मदद और खनन वाहनों के लिए हर साल वैकल्पिक मार्ग बनाता है, जो बरसात में बह जाने के कारण औसतन केवल छह महीने तक ही चल पाता है। ऐसे में पांच सालों में करीब 912 दिन लोगों को काठगोदाम पुल की तरफ से ही चक्कर लगाना पड़ा है। यही चक्कर लोगों को भारी पड़ गया है। अगर एक दिन में औसतन 500 वाहन चले हैं, तो 912 दिन में 456000 वाहन हल्द्वानी से गौलापार आए गए। इसमें औसतन 30 किमी की दूरी अधिक तय की गई, तो इन वाहनों ने अब तक करीब 14 लाख किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाया हैं। इस दूरी के लिए लोगों की जेब भी ढीली हुई है। औसतन एक वाहन पर 50 रुपये का पेट्रोल/डीजल लगा, तो एक ही दिन में 25000 रुपये खर्च हो गए। इस हिसाब से अब तक लोग करीब सवा दो करोड़ से ज्यादा इस दूरी को तय करने में खर्च कर चुके हैं।

50 लाख वैकल्पिक मार्ग पर खर्च
हल्द्वानी। बात केवल इसी खर्च की नहीं है। पांच साल से वन विभाग गौला नदी में वैकल्पिक मार्ग पर तैयार कर रहा है, जिसमें हर साल करीब एक किलोमीटर का रास्ता बनाया जाता है। इसमें करीब दस लाख का खर्च हर साल होता है। इस तरह करीब 50 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।
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पुल निर्माण में 15 करोड़
हल्द्वानी। पुल समय पर भले पूरा न हो, पर इसके निर्माण में करीब 15 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। पुल भारी वाहनों के लिए सितंबर तक खुलने की उम्मीद है।
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