हल्द्वानी। सरकार और वन विभाग अपनी जमीन को लेकर कितना संजीदा है इसका पता दमुवाढूंगा खाम (जवाहर ज्योति) बनाम प्रदेश सरकार का केस देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। केस को हाईकोर्ट में दायर हुए नौ साल होने को हैं लेकिन इसमें अब तक एक बार भी बहस नहीं हो पाई। तारीख पर तारीख सिर्फ इसलिए लगती रही क्योंकि अधिकांश बार सरकार या वन विभाग की तरफ से कोर्ट में खड़ा होने को कोई नहीं पहुंचा। एक-दो बार गांव की तरफ से प्रतिनिधि नहीं आए, क्योंकि उन्हें मामला लंबा खिंचने में कोई नुकसान नहीं। अब इस क्षेत्र के नगर निगम में शामिल होने की घोषणा हो चुकी है। लेकिन इन वर्षों में वन विभाग ने क्यों पैरवी में लापरवाही की बड़ा सवाल है?
दमुवाढूंगा खाम (जवाहर ज्योति) और वन विभाग के बीच विवाद तब शुरू हुआ जब जुलाई 2005 में ग्रामीणों को वन विभाग ने जमीन खाली करने के लिए नोटिस भेजे। वन विभाग का आरोप है कि ग्रामीण करीब 543 एकड़ आरक्षित वन भूमि पर बसे हैं। यह क्षेत्र करीब सात किलोमीटर में फैला हुआ है और नौ वार्डों से मिलकर बनता है। 2005 में यहां करीब 2000 परिवार बसे थे जबकि अब इनकी संख्या 2218 के पास पहुंच चुकी है। नोटिस मिलने के तुरंत बाद ग्रामीण हाईकोर्ट चले गए और तत्कालीन ग्राम प्रधान विजय चंद्र बनाम उत्तरांचल सरकार के नाम से मामला दर्ज हुआ। बाद में ग्राम प्रधान महेश जोशी ने भी इस मामले को अपने नाम नहीं कराया क्योंकि वन विभाग ही इसमें रुचि नहीं ले रहा था।
ग्रामीणों की तरफ से पैरवी कर रहे हल्द्वानी बार एसोसिएशन के सचिव गोविंद बिष्ट कहते हैं कि तारीखें लगीं, लेकिन अब तक कोई बहस नहीं हो पाई। उधर, रामनगर वन प्रभाग के एसडीओ जीएस कार्की कहते हैं कि पिछले पांच महीने से कोई तारीख नहीं लगी है। ग्रामीण वन भूमि पर बसे हैं इसे खाली करवाने के लिए वन विभाग संजीदा है। अभी इस मामले में हाईकोर्ट से स्टे मिला हुआ है। दमुवाढूंगा खाम के नगर निगम में शामिल होने संबंधी कोई आधिकारिक जानकारी अभी नहीं मिली है।