हल्द्वानी। खनिज निकासी में ट्रांजिट फीस (दूसरी बार वाली) को खत्म करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए शासन स्तर कथित तौर पर कई ताकतवर स्टोन क्रशर स्वामियों ने जोरदार पैरवी की है। सूत्रों के अनुसार अंदरखाने शासन भी तैयार बताया जा रहा है। इसके लिए कोई ‘विधि सम्मत’ तरीका निकाल कर फैसला लिया जा सकता है।
1978 तक खनिज निकासी ट्रांजिट फीस 50 पैसे प्रति क्विंटल ली जाती थी, इसमें नदी से निकलने वाले पहले और बाद में स्टोन क्रशर के क्रस्ड माल पर दूसरे स्तर पर फीस ली जाती थी। क्रश्ड माल पर ट्रांजिट फीस लेने के खिलाफ 2003 में स्टोन क्रशर स्वामी हाईकोर्ट गए थे, जिस पर स्टे हो गया। 2012 में शासन ने नदी से निकलने वाले खनिज पर ट्रांजिट फीस को 50 पैसे से बढ़ाकर 5 रुपया कर दी। क्रश्ड माल में ट्रांजिट फीस पर भी जंगलात ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की, जिसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर नवंबर-2013 में स्टे हो गया। ऐसे दोनों स्तर पर ही वन विभाग ने ट्रांजिट फीस पांच रुपया प्रति क्विंटल वसूल रहा है। केवल ट्रांजिट फीस से ही करीब सवा अरब से ज्यादा का राजस्व शासन को मिल रहा है। अब इसके खिलाफ स्टोन क्रशर व्यवसायी लामबंद हो गए हैं। उन्होंने गौला में खनन कराने और खनिज खरीदने से इनकार कर दिया। इसके अलावा ट्रांजिट फीस को लेकर शासन स्तर पर लामबंदी की है। उनका तर्क है कि ट्रांजिट फीस का सीधा संबंध राजस्व से नहीं है। यह केवल रेगुलेशन का एक माध्यम है, ऐसे में इतनी ट्रांजिट फीस लेना ठीक नहीं है। वह यूपी में पड़ने वाले ट्रांजिट फीस का भी तर्क दे रहे हैं, जो कि 3 रुपया 40 पैसा प्रति क्विंटल है।
शासन में नदी से निकलने वाले ट्रांजिट फीस को पांच रुपया से घटाकर डेढ़ रुपए करने का दबाव बनाया जा रहा है। इसके अलावा स्टोन क्रशर के क्रश्ड माल पर पड़ने वाले ट्रांजिट फीस को खत्म करने की पैरवी है। सबसे ज्यादा ट्रांजिट फीस गौला के कारण तराई पूर्वी वन प्रभाग सबसे ज्यादा वसूलता है।