हल्द्वानी। मुख्यमंत्री की सुरक्षा में हुई चूक तो नैनीताल पुलिस की भारी लापरवाही थी ही। मगर भाजयुमो कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज करना उससे बड़ी भूल थी। पुलिस को सही कानून जानकारी नहीं होने की बात भी इस लापरवाही से सामने आई। पुलिस ने पांचों आरोपियों के खिलाफ मुख्यमंत्री हरीश रावत पर जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज किया। मगर केस डायरी में इस बात का जिक्र नहीं किया कि आरोपी सीएम पर जानलेवा हमले की नीयत से आए थे और उनके पास ऐसे हथियार थे। जो कि जानलेवा हमले के लिए जरूरी थे।
इस मामले में भी पुलिस ने संजय परगई द्वारा पत्थर फेंके जाने से गाड़ी का शीशा टूटने की बात तो केस डायरी में लिखी। मगर ये नहीं लिखा कि इससे किसी को क्षति पहुंची। इसके अलावा पुलिस ने पथराव में 307 की धारा लगा दी। जबकि पत्थर से किसी को क्षति नहीं हुई थी। कोर्ट ने पुलिस को नसीहत दी कि अगर क्षति हो भी जाती तो उसे भी महज आईपीसी की धारा 336(लापरवाही से किसी की जान और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालना) के तहत ही माना जाता। लेकिन पुलिस को ये बात नहीं पता थी। कोर्ट ने इसके लिए गुजरात सरकार बनाम एक व्यक्ति के केस का हवाला दिया। सारे तथ्यों और पुलिस के कमजोर केस के चलते इस मामले में 307 कोर्ट में टिक ही नहीं पायी। पुलिस की ये गलती पांचों अभियुक्तों के लिए तो राहत रही ही, लेकिन भाजपा के लिए ये एक बड़ा मुद्दा हो गया पुलिस और सरकार को घेरने का। क्योंकि 336, 307 के मुकाबले काफी हल्की धारा है।