पिथौरागढ़। स्कूल में पढ़ाने को गुरुजी नहीं, अस्पताल में चिकित्सक नहीं। पर मामला यहीं खत्म नहीं होता। सबसे अधिक राजस्व देने वाले आबकारी विभाग की तस्वीर इससे किसी तरह अलग नहीं है। यह मलाईदार महकमा संसाधनों की जबर्दस्त कमी के बीच काम करने को मजबूर है। जिले में मुखिया का पद तो नहीं है। साथ ही पूरा विभाग इकलौते निरीक्षक के हवाले है। स्टाफ की कमी विभागीय कामकाज प्रभावित हो रहा है। वहीं अवैध धंधेबाजी को रोकने में भी महकमे के पसीने छूट रहे हैं।
आबकारी विभाग फटेहाल है। छह तहसील और आठ विकासखंड वाले पिथौरागढ़ जिले की सरहद का नेपाल से लगना भी चुनौती है। यहां न शराब के शौकीनों की कमी है और न ही शराब की दुकानों की। विभाग के मुताबिक 13 विदेशी समेत कुल 25 दारू की दुकानों से महकमे को बीते वित्त वर्ष में 31.35 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ और इस साल राजस्व में दस प्रतिशत इजाफा हुआ है। औसतन करीब 14 हजार बोतलों की जिले में हर रोज बिक्री हो रही है।
लेकिन धनवर्षा करने वाला यह महकमा बदहाली से जूझ रहा है। विभाग में ज्यादातर पद खाली हैं। कुल 24 पदों में से नौ पद ही भरे गए हैं। नेपाल सीमा के अलावा अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत से लगे इस जिले की पूरी जिम्मेदारी अकेले निरीक्षक के जिम्मे हैं, जबकि यहां के चार सर्किलों में चार इंस्पेक्टर होने चाहिए थे। विभागीय मुखिया जिला आबकारी अधिकारी की कुर्सी बीते डेढ़ साल से खाली है और इस वक्त इस पद का अतिरिक्त कार्यभार एडीएम बीएल राणा के जिम्मे है।
कार्यालय में भी ज्यादातर कुर्सियां खाली हैं। दो में से एक ही लिपिक है। आबकारी सिपाही के नौ पदों में से मात्र दो कार्यरत हैं। आबकारी निरीक्षक देवेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि कार्मिकों की कमी से काम का बोझ बढ़ा है। वहीं स्टाफ की कमी अवैध शराब के धंधेबाजों पर लगाम कसने को और चुनौतीपूर्ण बना रही है।