उत्तरकाशी। गोविंद नेशनल पार्क और सेंचुरी प्रबंध ने ईको सेंसटिव जोन के लिए पुराना प्रस्ताव ही भेजा है। इसमें पार्क और ईको सेंसटिव जोन की सीमा हिमाचल से लेकर भागीरथी घाटी के सुक्की गांव के ऊपर तक का क्षेत्र शामिल है। जिससे उनके चारागाहों पर भी प्रतिबंध लग जाएगा। ऐसे में ग्रामीणों के समक्ष भेड़-बकरी पालन और खेती से जुड़ी आजीविका प्रभावित होनी तय है। यही वजह है कि लोग इसके खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं।
गोविंद नेशनल पार्क और ईको सेंसटिव जोन के लिए ऐसा प्रस्ताव नहीं बनाया गया, जिससे जनता के हित सुरक्षित रहते। पार्क और सेंचुरी के कारण क्षेत्र के 36 गांव विकास की धूप से दूर हैं। वन्य जंतु संरक्षण अधिनियम के कारण यहां सड़कें नहीं बन पा रही हैं। जिससे ग्रामीण 10 से 27 किमी पैदल चलने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि रियासत काल से अनुमन्य पीडी और फ्रीग्रांट की लकड़ी भी नहीं मिल पा रही है। जिससे उनके सामने मकानों की मरम्मत का भी संकट है। ग्रामीण इस क्षेत्र को पार्क और ईको सेंसटिव जोन से बाहर रखने की मांग करते रहे हैं। बावजूद इसके कोई नया प्रस्ताव तैयार नहीं किया गया। पुराने प्रस्तावों को ही अग्रसारित किया गया है। जिसमें हिम तेंदुआ के लिए संरक्षित बर्फानी क्षेत्र को हिमाचल की सीमा, टौंस, अपर यमुना तथा उत्तरकाशी वन प्रभाग में भागीरथी घाटी के सुक्की गांव के ऊपर का 450 वर्ग किमी क्षेत्र शामिल किया गया है। पार्क का संरक्षित क्षेत्र 957.96 वर्ग किमी से बढ़ाकर मय ईको सेंसटिव जोन 1407.96 वर्ग किमी तक किया गया है।
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गोविंद पशु विहार के कारण उनके 80 परिवारों के गांव में लोगों ने आज तक बिजली नहीं देखी। सड़क बनने में अड़ंगा लगने से उन्हें नैटवाड़ से 14 किमी पैदल जाना पड़ रहा है। गदेरों में बही पुलिया भी नहीं बन पा रही हैं। ऐसे में यहां ग्रामीण भी पशु विहार के जंगली जानवरों की तरह पशुवत जीवन जी रहे हैं।- बालचंद, ग्राम प्रधान नूराणू।
सेंचुरी का दायरा बढ़ने से भेड़-बकरियों के चारागाह सिमट जाएंगे। पार्क में शामिल सौड़, सांकरी, जखोल, फिताड़ी से ओसला तक के क्षेत्र में ऊन, खाद और मांस की बढ़ती मांग से ग्रामीण भेड़ बकरियों की नई टोलियां खरीद रहे हैं। लेकिन सरकार जंगली जानवर पाल रही है। लोग पशुपालन व खेती बागवानी से अपना पेट पाल रहे हैं। इन दोनों में सामंजस्य न बैठने से ग्रामीणों का ही नुकसान हो रहा है।- चैन सिंह, निवासी सौड़ सांकरी।
पशु विहार की बंदिशों के कारण उपजे जन असंतोष को देखते हुए ईको सेंसटिव जोन का दायरा गांव के बाहर निर्जन और बर्फानी खाली क्षेत्रों में करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट डायरेक्शन है कि सेंचुरी क्षेत्र में बिजली, पानी की लाइन ले जाने में किसी तरह की रोक न लगाएं। प्रस्ताव तैयार कर प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव के माध्यम से शासन तक पहुंचा दिया गया है।- एमपी सिंह, वार्डन गोविंद पशु विहार।