जीवन देखा, जग देख रही
शीशु, तरुण, प्रौद वृद्ध यही क्रम है।
अतीत स्मृतियो का संग्रह
हैं वर्तमान भी मोह जाल
काया कल्पित भावी जीवन मैं
किंचित ना स्वीकार करू
हे प्रिय! तुम्हें निमंत्रण है, आओ मैं अंगीकार करूं..
सुक्ष्म धूलि - कण के मिलने से
क्या रुका पवन का वेग कहीं
फिर ये मन होने, ना होने से,
क्यों रुके ऋष्टि का सृजन कहीं
अब ना देखूं संसार स्वपन,
सत- जागृति का आधार धरूं
हे प्रिय! तुम्हें निमंत्रण है, आओ मैं अंगीकार करुं.
एक देहि हैं, एक प्राण न दूजा मन- मीत कहीं
मैं असीम शान्त एकांत प्रलय में
मेरा मुझमें संगीत कहीं
है चाह अगम की, है राह अगम
मैं सर्वस्व अगम पर वार-मरू
हे प्रिय! तुम्हें निमंत्रण है, आओ मैं अंगीकार करूं
- लक्ष्मी अगम
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