इस्लाम में बुतों से कोई वास्ता रखना हराम है, पाप है। लेकिन, लेबनान की राजधानी बेरूत में रहने वाले मोहम्मद लहम और उसके परिवार के लिए मूर्तियां बेहद अहम हैं। मोहम्मद कहते हैं कि वो किसी से ये बात नहीं छुपाते की वो मुसलमान हैं। वो सबको अपना नाम मोहम्मद ही बताते हैं, जबकि उनका बुलाने का नाम अबू इस्कंदर है।
मोहम्मद, सीरिया की राजधानी दमिश्क के रहने वाले हैं। मगर वहां गृह युद्ध की वजह से वो भागकर लेबनान आ गए। यहां वो मूर्तियां गढ़ने का काम करते हैं। यहां पराए देश में मोहम्मद से कोई नहीं पूछता कि आख़िर वो मुसलमान होकर भी मूर्तियां क्यों बनाते हैं।
मोहम्मद ने मूर्तियां बनाने का हुनर फ़ोन पर सीखा था। उनके भाई ने उन्हें फ़ोन पर बताया था कि बुतों को कैसे गढ़ते हैं। वो जीसस और वर्जिन मैरी की मूर्तियां बनाते हैं। वो ईसाई धर्म के दूसरे किरदारों के बुत भी गढ़ते हैं मोहम्मद कहते हैं कि वो मूर्तियां सिर्फ़ बनाते हैं, उनकी पूजा थोड़े करते हैं। जो लोग इन्हें ख़रीदते हैं वो भी इन्हें सजावट के तौर पर ही रखते हैं।
लेबनान आने से पहले मोहम्मद दमिश्क में चमड़े की एक बड़ी दुकान चलाया करते थे। मगर जंग की वजह से सब कुछ तबाह हो गया। मोहम्मद मानते हैं कि बंधे-बंधाए उसूलों पर चलने से कुछ नहीं होगा। हम पाबंदियां तोड़ेंगे तभी तो लोग एक-दूसरे के क़रीब आएंगे। मोहम्मद कहते हैं कि मूर्तियां वो पैसे के लिए नहीं बनाते। बस उन्हें बुत गढ़ना अच्छा लगता है। जब उनकी कोई मूर्ति तैयार हो जाती है, तो उन्हें बहुत ख़ुशी मिलती है।
मूर्तियां बनाना मोहम्मद की हॉबी है। वो इसे अपनी कला बताते हैं। उन्हें संत शार्बल के बुत बनाना सबसे ज़्यादा पसंद है। इसे बनाना आसान होता है। मोहम्मद को संत शार्बल के बुत बहुत ख़ूबसूरत लगते हैं।