असम-मेघालय सीमा विवाद: समस्या सुलझाने के लिए ऐतिहासिक समझौता, जानिए क्या हैं इसके मायने?
सीमा विवाद को निपटाने के लिए ‘लेना और देना’ की नीति पर चलना होगा। कुछ हिस्से मेघालय को देना होगा और कुछ मेघालय को असम के लिए छोड़ना होगा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
असम और मेघालय के बीच सीमा विवाद सुलाझाने के लिए दोनों राज्यों के बीच मंगलवार को ऐतिहासिक समझौता हुआ। ऐसे व्यवहारिक प्रयासों से ही अंतर्राज्यीय विवादों को सुलझाया जा सकता है।
पांच दशकों से लंबित असम मेघालय सीमा समस्या के समाधान के लिए मंगलवार को असम और मेघालय के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में असम के मुख्यमंत्री डा हिमंत विश्व शर्मा तथा मेघालय के मुख्यमंत्री करनाड संगमा ने छह स्थानों पर सीमा विवाद सुलझाने के लिए समझौता पर हस्ताक्षय किया।
इन दो राज्यों के बीच कुल बारह स्थानों पर सीमा को लेकर विवाद है। इस पहल के लिए असम के मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया जाना चाहिए, जिन्होंने सीमा निर्धारण के लिए कानूनी सलाह की जगह व्यवहारिक प्रयास किया और स्थानीय लोगों की सलाह के अनुसार दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाई।
विज्ञापन Trending Videos
निश्चित रूप से मेघालय के मुख्यमंत्री ने इस बात को समझा कि व्यवहारिक पहल से सीमा क्षेत्र में बार-बार होने वाले तनाव को सुलझाया जा सकता है। यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि दो राज्यों के बीच के सीमा विवाद को बातचीत और आपसी सहमति के आधार पर ही सुलझाया जा सकता है। अदालत में ऐसे फैसले बड़ी मुश्किल से सुलझ सकते हैं और इसमें लंबा समय लगता है।
नगालैंड के साथ असम का सीमा विवाद लंबे समय से उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है। सीमा पर तनाव रहने की वजह से दो पड़ोसी राज्यों के बीच भी अक्सर तनाव हो जाता है। असम-मिजोरम सीमा पर घटी घटना इस बात का प्रमाण है, जिसमें असम पुलिस के छह जवान मारे गए थे ।
पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति
यदि असम ने अपनी तरफ से संयम नहीं बरता होता तो असम-मिजोरम सीमा पर भारत-पाकिस्तान वाली स्थिति पैदा हो जाती। जबकि पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि राज्यों के बीच मधुर संबंध रहना जरूरी है।
पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में जमीन से जाने के लिए असम से गुजरना होता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद से डा हिमंत विश्व शर्मा ने असम से सटे राज्यों के साथ आपसी बातचीत से सीमा समस्या का समाधान करने का प्रयास आरंभ किया है। उस दिशा में असम और मेघालय के बीच का प्रयास एक निश्चित मुकाम तक पहुंच गया है।
विवाद सुलझाने की कोशिश
असम-मेघालय के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक साथ पूरे विवाद को सुलझाने की जगह कोशिश यह की गई कि एक-एक जगह का विवाद निपटाया जाए। पहले छह स्थानों के लिए आपसी सहमति बनी। फिर उस पर केंद्र सरकार की सहमति से समझौते का रूप दे दिया गया।
अब भारतीय सर्वेक्षण ब्यूरो नए सिरे से सीमांकन करके उसे अमली रूप देगा, यानी अब छह स्थानों पर कोई सीमा विवाद नहीें होगा। केंद्र ने भी साफ कर दिया है कि यदि राज्यों के बीच आपसी सहमति से समाधान हो जाता है तो एक अच्छी बात है।
यह तो साफ है कि सीमा विवाद को निपटाने के लिए ‘लेना और देना’ की नीति पर चलना होगा। कुछ हिस्से मेघालय को देना होगा और कुछ मेघालय को असम के लिए छोड़ना होगा। कई इलाके ऐसे हैं, जहां पर कोई आबादी नहीं है। कुछ एकड़ खाली जमीन हैं। कहीं पर मात्र एक मैदान को लेकर विवाद है।
समिति ने ली आमलोगों की राय
सीमा विवाद सुमझाने के लिए जमीनी हकीकत को जानना जरूरी है। इसके लिए दोनों राज्यों ने मंत्री स्तरीय तीन समितियों का गठन कर दिया था। उन समतियों ने विवादित इलाके में जाकर आमलोगों की राय जानी और स्थिति को समझा। प्रारंभिक स्तर पर उन स्थानों का चयन किया गया, जहां मामले अधिक जटिल नहीं हैं। आपसी समझ से उन्हें सुलझाया जा सकता है।
समितियों की रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री स्तर की वार्ता में आम सहमति बनाने का प्रयास हुआ।
असम कैबिनेट ने पहले चरण में 36.79 वर्ग किलोमीटर विवादित क्षेत्र को सुलझाने का फैसला लिया है, जिसमें से असम को 18.51 वर्ग किलोमीटर और मेघालय को 18.28 किलोमीटर देने पर सहमति बनी है। असम से काटकर 1972 में मेघालय और मिजोरम का गठन किया गया था। तब से सीमा विवाद जारी है। कई बार हिंसक घटनाएं घट चुकी है।
हालांकि विपक्षी दल इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनकी मांग है कि असम की जमीन देने के पहले इस बारे में विधानसभा में चर्चा होनी चाहिए।
इसमें दो राय नहीं है कि इस तरह का फैसला लेने के पहले सभी पक्षों की सहमति होनी चाहिए। असम सरकार को विधानसभा में चर्चा करनी चाहिए, लेकिन विपक्षी दलों को भी व्यवहारिक नजरिया अपनाना चाहिए, क्योंकि यह प्रयास राज्य के हित में जरूरी है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।