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अधखुले दरीचों से
नई दिल्ली
Updated Sun, 05 May 2013 12:08 AM IST
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‘उस दिन की तलाश में हूं, जिसका सातों दिन से कोई नाता न हो’। ‘लय और ताल की तुकबंदी से अलग कविताओं में भी सीधी बात कहने वाले वरिष्ठ कवि बख्शीश सिंह का यही अंदाज उन्हें भीड़ में अलग बनाता है। उनके काव्य संग्रह ‘अधखुले दरीचों से’ में उनके इसी अंदाज से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है।
हिंदी और पंजाबी में समान रूप से सक्रिय होने के कारण कवि की शैली में भाषागत विभिन्नता के कई आयाम दिखते हैं। साथ ही बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में जन्म होने के कारण उर्दू अल्फाजों का उपयोग भी कविता के भावनात्मक शिल्प को ज्यादा मजबूत करता है। इसकी एक झलक इस तरह मिलती है, ‘इधर-उधर से झांकती हैं चुप्पियां’।
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सबसे अच्छी बात यह भी है कि बख्शीश जी की कविताएं पढ़ने के लिए आपको अपनी व्यस्त जीवनचर्या से ज्यादा वक्त निकालने की भी जरूरत नहीं है। उनकी छोटी-छोटी कविताएं पल भर में ही बड़ी बात कह जाती हैं। तरह-तरह के बिंब और कथानकों की बजाय बख्शीश जी अपनी कविताओं में पाठक को अपना बिंब खुद तैयार करने का मौका देते हैं। यह अंदाज उनकी कविताओं को जीवंत और हर वक्त के लिहाज से प्रासंगिक बना देता है।
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बाबा फरीद
कविता, समय और समाज की तसवीर होती है। सूफी कवि बाबा फरीद की रचनाओं को पढ़ने के बाद यह अहसास और भी ज्यादा होता है। इतिहास के अनुसार बाबा फरीद का जीवनकाल बेशक 1173 से 1266 तक है, लेकिन उनकी कविताओं और विचारों के जरिये वे समय की सीमा से परे युगों-युगों तक लोगों के बीच जीने का हुनर रखते हैं।
मुल्तान (अब पाकिस्तान में) के कोठीवाल क्षेत्र के एक मुस्लिम परिवार में जन्मे फरीदुद्दीन मसूद काफी कम उम्र में ही खुदा की बंदगी में लग गए थे। कई सालों तक उन्होंने जंगलों में रहकर साधना की। उन्होंने इसलाम का प्रचार भी किया, लेकिन बाकी सभी धर्मों को भी समानभाव से सम्मान दिया।
‘बाबा फरीद’ नाम की पुस्तक में बख्शीश सिंह ने बाबा फरीद की शिक्षा और कविता का पंजाबी से सरल हिंदी अनुवाद कर उसे आज की पीढ़ी के लिए एक जरूरी किताब बना दिया है।
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