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अब काम दिखाने की बारी

एम के वेणु Updated Tue, 14 Oct 2014 07:27 PM IST
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Its's time to action
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भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कुछ दिन पहले वाशिंगटन में जब यह कहा कि आने वाले कुछ महीनों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था और कमजोर हो सकती है और उसके बाद अगले वर्ष ही इसमें कुछ स्थिरता नजर आएगी, तो एक तरह से वह अर्थव्यवस्था को लेकर चेतावनी ही दे रहे थे।



देश के केंद्रीय बैंक के प्रमुख का यह बयान नरेंद्र मोदी सरकार के उस दावे के बिल्कुल उलट है, जिसमें कहा गया कि देश की अर्थव्यवस्था के अपने निम्नतम बिंदु पर पहुंच जाने के बाद अब तो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर सुधार की ओर है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले महीने अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए खुद की पीठ ठोंक चुके हैं, जब वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में विकास दर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गई थी, जो कि कुछ तिमाहियों पहले के आंकड़े 4.7 प्रतिशत से ज्यादा थी।
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5.7 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर से बाजार बेशक कुछ हद तक उत्साहित हो, मगर रिजर्व बैंक के गवर्नर ने यह कहकर कि अगली कुछ तिमाहियों में विकास दर में उतार-चढ़ाव दिख सकता है, माहौल को संतुलित करने की कोशिश की है। इतना ही नहीं, रिजर्व बैंक के गवर्नर महोदय ने यह भी कहा कि सिर्फ बातें करना बेमानी है, जरूरत जमीनी स्तर पर कदम उठाने की है।
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रिजर्व बैंक के गवर्नर की भावनाओं की गूंज उद्योग जगत के एक दिग्गज और एचडीएफसी समूह के चेयरमैन दीपक पारेख के विचारों में भी मिलती है, जब एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अर्थव्यवस्था को लेकर चौकन्ना रहने की बात कही। पारेख ने कहा कि समय आ गया है कि सरकार अब फैसले लेने शुरू करे। मसलन, किसी को नहीं मालूम कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवंटन रद्द किए जाने के बाद सभी कोयला खदानों का क्या होगा।

कोल इंडिया का कहना है कि मानवीय संसाधनों की कमी के चलते उसके लिए इन खदानों का प्रबंधन करना मुश्किल होगा। उल्लेखनीय है कि फिलहाल तो कोल इंडिया के पास चेयरमैन तक नहीं है। गैस के मूल्य पर अपने फैसले को सरकार दो बार स्थगित भी कर चुकी है। पारेख कहते हैं, 'यह तो बिग बैंग (क्रांतिकारी) सुधार नहीं हैं।' ऐसा पहली बार है, जब किसी बड़े उद्योगपति ने कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मोदी सरकार की निष्क्रियता की ओर साफ इशारा किया है।
अमूमन बिजनेसमैन सरकार के डर से खुलकर अपनी बात नहीं करते।

फिर जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हों, तो उनके लिए यह काम शायद और भी ज्यादा मुश्किल हो जाता है। दरअसल, हमारे देश में उद्योगपतियों के सत्ता पक्ष के आगे सार्वजनिक तौर पर नतमस्तक होने की मजबूत परंपरा रही है। ऐसे में, पारेख ने जो कहा, उसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है।

दरअसल रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के बयान में भी अप्रत्यक्ष्ा तौर पर यह संदेश छिपा है कि सरकार के पास अब ज्यादा समय नहीं है, इसलिए मोदी को तेजी से काम करना होगा। कुछ अर्थशास्त्री दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में जीडीपी विकास दर के तकरीबन पांच प्रतिशत रह जाने का अनुमान पहले ही जाहिर कर चुके है। जबकि पहली तिमाही में यह 5.7 प्रतिशत दर्ज की गई थी।

इस निराशाजनक अनुमान की वजह जुलाई और अगस्त में औद्योगिक उत्पादन की दर का नीचा रहना है। इसके अलावा मानसून के असमान वितरण के चलते कृषि विकास की दर भी कम हो सकती है। कहा जा सकता है कि अगर दूसरी तिमाही में विकास दर नीची रहती है, तो इससे न सिर्फ यह साबित होगा कि रिजर्व बैंक के गवर्नर सही थे, बल्कि अगर अगली कुछ तिमाहियों तक यही स्थिति रही, तो पांच महीने पूर्व सरकार गठन के समय से नरेंद्र मोदी को लेकर जो भावनात्मक माहौल बना हुआ है, उस पर भी असर पड़ेगा।

राजनीतिक हालात पूरी तरह मोदी के साथ हैं, इसके बावजूद वह महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों के प्रति अनिच्छुक दिख रहे हैं।  मसलन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का मूल्य नाटकीय ढंग से गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। इससे डीजल सब्सिडी में खुद ब खुद कमी आई है। अब डीजल के दाम में कमी करना भी सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। ऐसे में, सरकार बेहद आसानी से डीजल के मूल्य पर से अपने नियंत्रण में कमी ला सकती है। कहीं कुछ दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं है, फिर भी अगर सरकार दुविधा में है, तो यह समझ से बाहर है।

दरअसल फैसले लेने की गति धीमी होने की वजह शायद यह है कि मोदी व्यवस्था में बड़ा बदलाव करना चाह रहे हैं, जहां सभी मंत्रालयों के शीर्ष नौकरशाहों की जवाबदेही प्रधानमंत्री कार्यालय तय कर रहा है। हाल ही में कैबिनेट सचिव ने स्वच्छ भारत अभियान के क्रियान्वयन के मद्देनजर सभी राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये एक बैठक की। संपर्क का यह मॉडल उन सभी नीतिगत मसलों में अपनाया जा सकता है, जिनमें राज्यों का समर्थन जरूरी हो।

मोदी के 'मेक इन इंडिया' प्रोजेक्ट की कमान संभाले उद्योग सचिव अमिताभ कांत कहते हैं कि निवेश की बड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सहयोग जरूरी है। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते मध्य प्रदेश में वैश्विक निवेश फोरम के उद्घाटन के बाद निवेश को आकर्षित करने के लिए राज्यों की सक्रिय भूमिका का आह्वान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इसमें संदेह नहीं कि राज्यों के साथ सहयोग का एक मजबूत ढांचा तैयार करना ही केंद्र सरकार के लिए सुधारों की अगली सबसे बड़ी चुनौती है। मगर क्या मोदी इसके लिए तैयार हैं?

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