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पूंजी से अहम हैं नए विचार

विनोद खोसला Updated Tue, 28 Oct 2014 12:13 AM IST
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new vision is more important than money
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भारत जैसी उभरती ताकत के सामने यह मौका है कि वह क्या अपनाए और क्या छोड़े। मैंने वर्ष 2000 में नई दिल्ली में मैकेंजी ऐंड कंपनी द्वारा आयोजित एक तीन दिवसीय दूरसंचार सेमिनार की अध्यक्षता की थी, जिसमें कहा था कि अब लैंडलाइन के बजाय सीधे इंटरनेट और मोबाइल को अपनाना चाहिए। तब मैंने भी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी मोबाइल फोन इतना फैल जाएगा। मेरा तर्क था कि विशाल पारंपरिक दूरसंचार उपकरण और प्रणाली प्रदान करने वाले 21वीं शताब्दी के लिए गलत चीज पेश कर रहे हैं। सौभाग्य से लैंडलाइन की पारंपरिक टेक्नोलॉजी पर जोर देने के बावजूद मोबाइल फोन खूब लोकप्रिय हो गया। अफ्रीका ने भी मोबाइल टेलीफोनी को अपनाया। विकासशील देशों के लिए कई क्षेत्र हैं, जहां वे लंबी कूद वाली मानसिकता अपना कर भविष्य के लिए अलग रास्ते की तलाश कर सकते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐसे ही क्षेत्र हैं। पर ऐसे में जो चीज हम भूल जाते हैं, वह यह कि हम वैकल्पिक रास्ता कैसे बनाते हैं।



यह कहना काफी नहीं कि हम आगे की तरफ देखें और 2025 के लिए योजना बनाएं। ऐसी योजनाएं, कि अमुक तारीख तक हमें 40 नए विश्वविद्यालय खोलने हैं या 80,000 नए डाक्टर भर्ती करने हैं, आज के हिसाब से सोची हुई होती हैं। हड़बड़ी में कुछ विशेष काम करना एक बड़ी गलती है। टेक्नोलॉजी किस तरह आगे बढ़ती है, इसके बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिए भारतीय नेताओं को भविष्य का कयास लगाने के बजाय जो भी भविष्य का घटनाक्रम हो, उसके साथ तालमेल बिठाना चाहिए। दस ठोस लक्ष्य तय करने के बजाय उन्हें एक विकासपरक दिशा तय करनी चाहिए। इस तरह जैसे दुनिया बदलेगी और एक नई टेक्नोलॉजी का प्रादुर्भाव होगा, भारत उसी के अनुरूप अपने को ढाल सकेगा।
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मसलन, परिवहन भविष्य में भारत की एक बड़ी जरूरत होगा। एक पारंपरिक और सीधा-सादा मॉडल अपनाने के बजाय मैं इस पर विचार करूंगा कि 2025 तक खुद चलने वाली कारें, जो गूगल विकसित करने में लगी है, लोकप्रिय हो जाएंगी। इसके लिए अलग तरह के परिवहन इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। तब लोग कार खरीदने के बजाय ऐसे सोचने लगेंगे, जैसे हम टैक्सी लेने के बारे में सोचते हैं या आप जेट विमान खरीदने के बजाय उस तरह की साझा मिल्कियत ले सकते हैं, जैसी कि नेटजेट कंपनी ने पेश की है, जिसमें विमानों का पूरा बेड़ा होता है और आप मौके के हिसाब से विमान ले सकते हैं। जब कारों का भी ऐसा बेड़ा उपलब्ध होगा, तब आप अपने दैनिक उपयोग के लिए बीएमडब्ल्यू भी ले सकेंगे। तब पार्किंग के लिए भी कम जगह लगेगी। आज टेलीफोन कंपनियां सघन इलाकों में हर आदमी के लिए नई लाइन नहीं बिछातीं। अगर किसी बिल्डिंग में सौ लोग हैं, तो 20 या 25 लाइनों से काम चल जाता है। जब खुद चलनेवाली कारों का बेड़ा उपलब्ध होगा, तब हर आदमी के लिए अलग कार की जरूरत नहीं रहेगी। इससे स्टील की बचत होगी और तेल की खपत भी कम हो जाएगी।
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किसी नए इलेक्ट्रिक रेल नेटवर्क पर भारी पूंजी लगाने के बजाय इस तरह की व्यवस्था अपनाना ज्यादा सही होगा, जिसमें किसी एक परियोजना पर 10 अरब डॉलर लगाने के बजाय 20 हजार डॉलर लगाने से काम चलने लगे। जरूरत इसकी है कि दूरसंचार के अनुभव से हमने जो सीखा है, उसे कारों के मामले में लागू करें। अगर फैसला मेरे हाथ में हो, तो ऐसी कारों में से प्रथम 10 लाख कारों के लिए मैं बहुत अधिक कर लाभ दूं। ऊर्जा के मामले में जो कारें सबसे कम क्षमता वाली हों, उनमें से प्रथम 25 प्रतिशत पर क्यों न 10 प्रतिशत कर लगाया जाए, और इतनी ही राशि डॉलर में क्यों न उन 25 प्रतिशत कारों को मिले, जो ऊर्जा की दृष्टि से सर्वाधिक क्षमता वाली हों। इस तरह कंपनियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

अपने विराट घरेलू बाजार के कारण भारत अपने विकास के नियमों को बदल सकता है। आर ऐंड डी (शोध और विकास) करों में लाभ का मतलब होगा आर ऐंड डी को और प्रोत्साहन। इसी तरह मूल्य ह्रास के लिए भारी कटौती देने से कैपिटल इंटेंसिव सुविधाओं को प्रोत्साहन मिलेगा। यानी पहले कदम से वितरित विकास बढ़ेगा, जबकि दूसरे कदम से बड़े खिलाड़ियों का फायदा होगा।

अगर पर्यावरण तेजी से बदल रहा है, तो आप चाहेंगे कि आपका सिस्टम भी उसके अनुकूल हो। आप प्रतिष्ठानपरक पूंजीवाद के बजाय, जिसे मैं खोजपरक पूंजीवाद कहता हूं, उसे अपनाना चाहेंगे। प्रतिष्ठानपरक पूंजीवाद उदार मूल्य ह्रास नियमों पर चलता है, जो बड़े स्थापित खिलाड़ियों के पक्ष में जाते हैं, जबकि खोजपरक पूंजीवाद उदार आर ऐंड डी कर लाभों की पेशकश करता है, जो नए विचार के साथ आगे आने वाले प्रयोगधर्मी उद्यमियों के पक्ष में है। भारत में खोजपरक पूंजीवाद की ज्यादा जरूरत है। शिक्षा को लीजिए। केन्या में खोसला वेंचर्स ने ब्रिज इंटरनेशनल अकादमी में पैसा लगाया है, जो ऐसे सैकड़ों स्कूल चलती हैं, जो सिर्फ पांच डॉलर प्रति माह तक पर शिक्षा देते हैं, जिसे गरीब से गरीब भी वहन कर सकता है। यहां पाठ्यपुस्तकों के बजाय मोबाइल फोन के जरिये पढ़ाया जाता है। ऑनलाइन शिक्षा के कारण आज न केवल लागत घट रही है, बल्कि पढ़ाने की पारंपरिक पद्धति भी बदल रही है।  इसी तरह स्वास्थ्य सुरक्षा क्षेत्र में भी नई तरह से सोचना होगा।

बाहर के देशों में बसा भारतीय समुदाय पूंजी ही नहीं, नए प्रयोग करने की अपनी अभिलाषा के कारण भी एक बड़े संसाधन के रूप में उभरा है। और पूंजी की तुलना में नए विचार ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

(लेखक खोसला वेंचर्स के संस्थापक पार्टनर हैं और यह मैकेंजी ऐंड कंपनी द्वारा संपादित पुस्तक 'रीइमैजिनिंग इंडिया' में प्रकाशित उनके लेख का संपादित अंश है)

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