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बंगाल की राजनीतिक त्रासदी
हरिराम पांडेय
Updated Wed, 18 Jun 2014 06:47 PM IST
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पश्चिम बंगाल इन दिनों भयानक सियासी मश्किलों के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ भाजपा का तीव्र उभार और दूसरी तरफ एक तरह से अपराजेय कही जाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का पतन। इन दोनों ताकतों के बीच अपने वर्चस्व को कायम रखने की कोशिश में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस। एक तरफ भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में अच्छे दिन आने का नारा दिया है, तो वहीं औद्योगिकीकरण के लिए जमीन आसमान एक करने की कोशिश में लगी राज्य सरकार को अपने हाथ से सब कुछ छूटता महसूस हो रहा है।
अभी हाल में यहां एक जूट मिल में हुई हिंसक घटना ने राज्य के औद्योगिक विकास पर फिर सवाल खड़ा कर दिया है, क्योंकि इस घटना को लक्ष्य कर मिल मालिकों ने अपनी मिलें बंद करनी शुरू कर दी हैं। निवेश के लिए जूझते बंगाल में एक बार फिर औद्योगिक अशांति से भय का वातावरण पैदा हो गया है। बंगाल में साठ के दशक में आरंभ औद्योगिक हिंसा ने जो कुछ किया, उसका असर आज तक नहीं खत्म हो सका।
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अगर कोई यह जानना चाहे कि मानव संसाधन किस तरह नष्ट किया जाता है, तो बंगाल से बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। बंगाल की सबसे बड़ी त्रासदी है कि यहां किसी भी राजनीतिक आंदोलन का अंत हिंसा से होता है। 1953 में ट्राम भाड़ा एक पैसा बढ़ाए जाने के विरोध में भड़की हिंसा में कई ट्रामें आग के हवाले कर दी गई थीं। इसके बाद यहां यही सब चलता रहा और 1972 में अचानक हालात बदले और राजनीति में आपराधिक तत्वों का प्रवेश होने लगा, जो आज तक जारी है। कोलकाता, जहां की अर्थव्यवस्था मूलत: वाणिज्य पर टिकी है न कि उद्योगों पर, वहां एक तरह से राजनीति के लबादे में छिपे अपराधी विकास को नकारात्मक दिशा दे रहे हैं। किसी भी ताकतवर विपक्ष की अनुपस्थिति में यह फिनोमिना और बढ़ता जा रहा है। अभी हाल में जो हिंसक घटना हुई, बताया जाता है कि वह भी राजनीतिक लाभ के लिए उद्योगपतियों को धमकाने और उन पर नाजायज दबाव बनाने का नतीजा थी। चुनाव के दौरान राज्य सरकार ने मिलों को तीनों शिफ्ट में चलाने के लिए दबाव दिया और लगभग एक महीने में जो उत्पादन हुआ, उसके लिए बाजार नहीं मिलने के कारण मिलों ने उत्पादन बंद कर दिया और इसी मसले पर सत्तारूढ़ दल से संबद्ध यूनियनों से प्रबंधन का झगड़ा हुआ और उसके फलस्वरूप हत्या।
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बंगाल का समग्र राजनीतिक गठन विचित्र है। एक तरफ सत्तारूढ़ दल बेहद वर्चस्व में है और विपक्ष की औकात ही नहीं है। दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा फिलहाल विकास के क्रम में है और उसका संगठन तथा संगठन की सामाजिकता संघर्षशील नहीं है। दूसरी ओर कांग्रेस प्रभावहीन है और वामपंथी मार्क्सवादी पार्टी का पतन हो चुका है। माकपा के पतन का मुख्य कारण था, उसकी साख का संकट। एक जमाना था, जब माकपा को मजदूरों-किसानों की जंगजू पार्टी के रूप में लोग जानते थे। लेकिन इन दिनों उसकी यह छवि गायब हो चुकी है। त्रासद बात यह है कि माकपा का नेतृत्व इस चीज से वाकिफ होते हुए भी कोई सटीक कदम नहीं उठा पा रहा है। माकपा की छवि को हाल के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा झटका इस बात से लगा है कि इस पार्टी के समर्थकों का एक हिस्सा खुलेआम मोदी लहर की भेंट चढ़ चुका है और अभी जो समर्थक हैं, वे भविष्य में पार्टी के साथ रहेंगे, इस पर भी संदेह है। माकपा की नाकामी की एक बड़ी वजह यह है कि पार्टी का नेतृत्व नई पूंजीवादी वास्तविकताओं के अनुरूप वैकल्पिक यथार्थवादी लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का विकास नहीं कर पाया। साथ ही वह व्यवहारवादी राजनीति में प्रभावशाली नहीं है। माकपा का पुराना ढांचा अनुदार है। इसमें संवाद, विवाद एकतरफा होता है। इसमें नेता कहते हैं और कार्यकर्ता अनुकरण करते हैं। पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष के अपने शासन के दौरान उसने न तो अपना रवैया बदला और न ही ढांचा, जिससे स्थितियां बेहद त्रासद और पीड़ादायक दशा में पहुंच गईं।
अगर सत्तारूढ़ दल के अंदरूनी हालात को देखेंगे, तो महसूस होगा कि उसमें भी कमोबेश ये दुर्गुण आने लगे हैं। इस तरह पार्टी की सारी सदिइच्छाएं बेकार हैं, यदि वह पार्टी का आंतरिक और बाहरी ढांचा नहीं बदलती। तृणमूल के पार्टी तंत्र में नेता के अलावा सब चुप रहते हैं। तृणमूल ने माकपा के विरोध के नाम पर जो ढांचा विकसित किया, उसने उदारवाद के बजाय अनुदारवाद को पुख्ता बनाया।
वाममोर्चा पर जो उद्योग विरोधी होने का लेबल लगा था, वह प्रकारांतर से तृणमूल पर भी लगा। नतीजा यह हुआ कि 25 वर्ष से कम उम्र के नौजवानों के लिए मौके समाप्त हो गए और 40 वर्ष से नीचे की उम्र के लोगों में निराशा भरने लगी। सरकार एक तरफ मां, माटी और मानुष का नारा देती रही और दूसरी तरफ उद्योगों के लिए जमीन नहीं देने पर अड़ी रही। इसके गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं। अब अगर मोदी ऐसी राह निकालते हैं कि राज्य में निवेश हो और शारदा कांड के दोषियों को सजा मिले, तो यह तय है कि लाभ पाने वाले उपकृत होकर मोदी को लाभ पहुंचाएंगे। लेकिन भाजपा की भी एक त्रासदी है कि बंगाल की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए उसके पास यहां नेतृत्व नहीं है। दूसरी तरफ ममता बनर्जी न केवल अपनी पार्टी की नेता हैं, बल्कि एक सख्त और जुझारू नेता के तौर पर गिनी जाती हैं। यह अधिनायकवादी स्थिति पार्टी में अनुशासन बनाए रखने और उन्हें विकसित होने का अवसर देती है। बशर्ते उसकी दिशा और दशा, दोनों सही हो और समयानुरूप हो, तभी विकास हो सकता है। लेकिन उसके लिए जरूरी है कि नेताओं-कैडरों आदि को खुलकर बोलने, संवाद करने और लोकतंत्र का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए। लोकतंत्र का सम्मान और लोकतांत्रिक आचरण विकसित किए बिना यह संभव नहीं है।