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बंगाल में बढ़ते आतंकवाद का सच

हरिराम पाण्डेय Updated Thu, 30 Oct 2014 07:48 PM IST
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Truth behind increasing terrorism in Bengal
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पश्चिम बंगाल में सारदा घोटाला और बर्दवान बम कांड वस्तुतः दिनोंदिन खस्ताहाल होती जा रही अर्थव्यवस्था से उत्पन्न होने वाले असंतोष को दबाने के लिए उत्तेजक नारों और उन नारों के प्रति जगाने की कोशिशों का नतीजा है। ये दोनों घटनाएं ऊपरी तौर पर समझने में अलग-अलग महसूस होती हैं, पर दोनों बुनियादी तौर पर एक दूसरे से जुड़ी हैं। बंगाल की हताश जनता को सिंगुर आंदोलन के माध्यम से ममता बनर्जी ने 'कुछ करने' का सपना दिखाया और इस उम्मीद में जनता ने उन्हें सत्ता सौंप दी।



उम्मीद के झीने पर्दे को बनाए रखने के लिए सरकार ने जनता को चिटफंड का सब्जबाग दिखाया। इससे जमा पैसों से दो योजनाएं बनीं। एक, मीडिया कारोबार में पांव जमाने की, दूसरी कट्टर सांप्रदायिक तत्वों को राज्यों में बसाकर उनके माध्यम से वोटों का ध्रुवीकरण करने की।
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विगत दो महीनों में सारदा कांड और बर्दवान बम विस्फोट की जांच के बारे में भारत और बांग्लादेश के समाचार माध्यमों में जितना कुछ प्रकाशित-प्रचारित हुआ है, उनसे साफ लगता है कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल की शह पर जमात-उल-मुजाहिदीन आतंक का एक नेटवर्क बनाने में लगा है।इस नेटवर्क को मदद देने के लिए जमात के एक हिमायती को राज्यसभा में भेजा गया।
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सारदा के प्रमुख सुदीप्त सेन के अनुसार, इस सांसद के माध्यम से जमात के लिए बड़ी मात्रा में रुपये बांग्लादेश पहुंचाए गए। बर्दवान विस्फोट के बाद जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उनके बयान बताते हैं कि बांग्लादेश से भारत आने वाले सांप्रदायिक और आतंकी तत्वों का आवागमन इतना कभी नहीं था।

मुख्य विपक्षी दल माकपा हालांकि पहले से ही सत्तारूढ़ तृणमूल पर कट्टरवादियों को मदद देने के आरोप लगाती रही है, पर इसकी पुष्टि नहीं हो पाती थी। लेकिन अब वहां जो अधजले दस्तावेज बरामद हुए हैं उनपर बंगला और अरबी भाषाओं में नौजवानों से अल-जिहाद के नाम पर हथियार उठाने का आह्वान किया गया है। वीडियो में भी युवा जिहादियों को कड़ी ट्रेनिंग से गुजरते देखा जा सकता है। इसमें महिलाओं की भागीदारी भी कम नहीं है।

तृणमूल के यह राज्यसभा सांसद छात्र जीवन में सिमी के बड़े नेता हुआ करते थे। बाद में वह भारतीय जमात के नेता हुए। जब सारदा घोटाले में उन पर आरोप लगे, तो उन्होंने कहा कि चूंकि वह मुसलमान हैं, इसलिए उनसे यह बर्ताव किया जा रहा है। जमात का यह पुराना तरीका है कि जब भी कोई उसकी आलोचना करता है, तो वह उसे इस्लाम-विरोधी घोषित कर देती है।

जनता को ठगने वाली सारदा योजना से, जो सत्तारूढ़ दल के समर्थन के बगैर इतना फल-फूल नहीं सकती थी, हुई आय का एक भाग बांग्लादेश के एक इस्लामी बैंक में जमा कराया गया, जिसका उपयोग रीयल इस्टेट में निवेश के रूप होता था। सारदा घोटाले से हुई आय में से करीब 60 करोड़ रुपये जमायत-उल-मुजाहिदीन को भारत में आतंकी गतिविधियों को फैलाने के लिए दिए गए।

जमायत-ए-इस्लामी की पसलियों से जन्मा जमायत-उल-मुजाहिदीन पर बांग्लादेश में 2005 से पाबंदी है। नतीजतन उसने पश्चिम बंगाल में अपने पांव जमाने शुरू किए। पहले उसका इरादा पश्चिम बंगाल में बैठकर बांग्लादेश की सरकार को अस्थिर करने का था। लेकिन इसके ब्योरे हैं कि राज्य के सत्तारूढ़ दल ने उसका अपने हित में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया! भूलना नहीं चाहिए कि तृणमूल कांग्रेस की मर्जी के खिलाफ केंद्र ने बर्दवान बम कांड की जांच एनआईए को सौंपी है।

इतना ही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलकर सुरक्षा के मोर्चे पर राज्य की भयावह स्थिति पर केंद्र की चिंता और नाराजगी से उन्हें अवगत कराया है।

एनआईए की शुरुआती जांच के मुताबिक, बर्दवान धमाके में सामान्य अपराधी लिप्त नहीं थे। वहां जो अधजले दस्तावेज बरामद हुए हैं, उन पर बांग्ला और अरबी में नौजवानों से अल-जेहाद के नाम पर हथियार उठाने का आह्वान किया गया है। यानी अल कायदा प्रमुख अल जवाहिरी ने अल-जिहाद नामक जिस नए अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन की स्थापना करते हुए भारत को निशाना बनाने की बात कही थी, उसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल से हो चुकी है।

बर्दवान के जिस मकान में विस्फोट हुआ था.उसकी पहली मंजिल पर तृणमूल कांग्रेस का कार्यालय हुआ करता था। अभी तक राज्य के पांच-छह जिलों में आतंकी अड्डे और संदिग्ध मदरसे पाए गए हैं। राज्य में 2007 में 12 आतंकी घटनाई हुईं थीं, 2008 में ये 15 और 2014 में बढ़कर 40 हो गईं।

पश्चिम बंगाल में ये स्थितियां एकदम से नहीं पैदा हुई हैं। राज्य सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों पर मेहरबान है। उन्हें राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। राष्ट्रीयकृत बैंकों में इनके खाते तक खुलवाए जा रहे हैं। अजीत डोभाल के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हालांकि सुरक्षा के मोर्चे पर अपनी गलती स्वीकारी है। लेकिन बांग्लादेशी आतंकवादियों का राज्य में जमावड़ा सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के समर्थन के बगैर संभव नहीं है।

बांग्लादेश सरकार पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल पर पहले से यह आरोप लगा रही है कि वह जमायत-ए-इस्लामी और अन्य मुस्लिम चरमपंथी समूहों की मदद कर रही है। हाल ही में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात शेख हसीना से हुई थी, तो उन्होंने तृणमूल के एक राज्यसभा सांसद के तार सिमी और जमाते-इस्लामी से जुड़े होने की शिकायत की थी।

और भी कई संकेत हैं, जिससे पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के जमावड़े का सुबूत मिलता है। बांग्लादेश की सेक्यूलर ताकतों ने जब ढाका के शाहबाग चौक पर जमात और इस्लामी चरमपंथियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, तो कोलकाता में जमात-समर्थकों ने रैली की और बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष लोगों की इस्लाम-विरोधी बताते हुए निंदा की।

उस रैली में तृणमूल समर्थकों की बड़ी संख्या में मौजूदगी थी। साफ है, मां, माटी और मानुष के नारे के साथ राज्य की सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने लोगों को सिर्फ निराश ही नहीं किया है, बल्कि राज्य में पसरते आतंकवाद पर उनका अब तक का रवैया स्तब्ध करने वाला है।

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