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थमी संसद का जिम्मेदार कौन

एम के वेणु Updated Fri, 07 Aug 2015 08:10 PM IST
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Who responsible for parliyament deadlock
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लगता है कि संसद का मौजूदा सत्र बिना कामकाज के खत्म हो जाएगा। अब लगता है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम जैसा महत्वपूर्ण विधायी सुधार खटाई में पड़ जाएगा, जिसे अप्रैल, 2016 से लागू किया जाना है। एक तरफ जहां विपक्षी दलों ने भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर संसद का बहिष्कार कर रखा है, वहीं सत्तारूढ़ पार्टी सदन में बहस से ज्यादा उनकी कोई मांग मानने के लिए तैयार नहीं है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस बात पर जोर दे रही है कि सदन में बहस शुरू होने से पहले संबंधित नेताओं के खिलाफ कुछ कार्रवाई होनी चाहिए और उनसे इस्तीफा लेना चाहिए, लेकिन भाजपा उसकी मांग मानने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए यह गतिरोध खत्म होता नहीं दिख रहा।



हालांकि लोकसभा अध्यक्ष ने आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए कांग्रेस के 25 सांसदों को निलंबित कर दिया, नतीजतन कई विपक्षी दलों ने एकजुट होकर लोकसभा का बहिष्कार कर दिया। वाम दल, जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल, आम आदमी पार्टी, मुस्लिम लीग और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने मिलकर फैसला किया कि जब तक कांग्रेसी सांसद निलंबित रहेंगे, तब तक वे भी संसद के निचले सदन यानी लोकसभा का बहिष्कार करेंगे। जब तक कांग्रेसी सांसदों का निलंबन नहीं हुआ था, विपक्षी दल इतनी मजबूती से एकजुट नहीं थे। संसदीय रणनीति को लेकर विपक्षी दलों के बीच मतभेद थे, लेकिन अब लगता है कि कांग्रेसी सांसदों के निलंबन के बाद उन्होंने अपना रुख कठोर कर लिया है।
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मौजूदा गतिरोध इसलिए भी खत्म नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने ललित मोदी प्रकरण या व्यापम घोटाले पर कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया, यहां तक कि संसद से बाहर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। यह भाजपा के शुतुरमुर्गी रवैये को दर्शाता है, मानो कुछ भी गलत नहीं हुआ हो। यह लापरवाह रवैया संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू के बयान में भी दिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि 'भाजपा के किसी केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री ने कोई अवैध या अनैतिक काम नहीं किया है।' वेंकैया नायडू यह कैसे जानते हैं, जबकि व्यापाम घोटाले में सैकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जिनमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी अधिकारी भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई द्वारा सुबूत इकट्ठा करने से पहले ही संसदीय कार्य मंत्री आखिर शिवराज सिंह चौहान को कैसे क्लीन चिट दे सकते हैं? नायडू के उक्त बयान को जांच को प्रभावित करने के रूप में भी देखा जा सकता है।
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असल में राजग का यह शर्मनाक रवैया ही है, जिसने संसद में उसके लिए मुश्किलें खड़ी की हैं। भाजपा ने संभवतः मोदी के ही निर्देश पर हर तरह की रणनीति आजमाई, लेकिन उसने विपक्ष को एकजुट होने में ही मदद की। यह जानकर किसी को हैरानी हो सकती कि सत्तारूढ़ दल संसदीय कामकाज के सुचारु संचालन के प्रति कितनी अगंभीर है। मसलन, सत्र के तीसरे दिन ही भाजपा ने कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ विभिन्न तरह के भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए तीखा पलटवार किया। यह तब हुआ, जब कांग्रेस संसद के बहिष्कार को वापस लेने और ललित मोदी प्रकरण और व्यापम घोटाले पर बहस में शामिल होने के लिए पार्टी के भीतर चर्चा कर रही थी। यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे कुछ विपक्षी दल वस्तुतः सदन के भीतर बहस में शामिल होने की बात कर रहे थे। फिर भी भाजपा ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और केरल के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आक्रामक हमला किया। इसने मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को काफी उत्तेजित किया और वहीं से बात बिगड़ने लगी। उसके बाद राहुल गांधी ने सुषमा स्वराज के खिलाफ आपराधिक कदाचार का आरोप लगाया, जिसके विरोध में भाजपा ने राहुल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी।

यह सब देखकर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि क्या भाजपा वाकई जीएसटी या संशोधित भूमि अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण विधेयक कांग्रेस की सहायता से पारित करवाने के प्रति गंभीर थी। एक अन्य मौके पर भाजपा ने लोकसभा में बिना जरूरत के 'हिंदू आतंक' का मुद्दा उठाया, संभवतः ऐसा आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए किया गया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरदासपुर में पाकिस्तानी घुसपैठिए के आतंकी हमले पर लोकसभा में एक लिखित बयान पढ़ा। इस बयान का दोनों पक्षों ने समर्थन किया। लेकिन लिखित बयान पढ़ने के तुरंत बाद गृह मंत्री ने कांग्रेस को उकसाते हुए यूपीए के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के वर्ष 2013 में दिए गए 'हिंदू आतंक' से संबंधित बयान का जिक्र छेड़ दिया। सदन में हर कोई राजनाथ सिंह के इस अप्रत्याशित संदर्भ से हैरान था। सदन में एक बार फिर से हंगामा शुरू हो गया।

सबसे बड़ा सवाल है कि भाजपा ने ऐसा क्यों किया। साफ है कि भाजपा चाहती है कि जहां तक संभव हो, लोगों का ध्यान ललित मोदी प्रकरण और व्यापम घोटाले से भटकाया जाए। इसलिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जारी संसदीय गतिरोध के बीच भाजपा सोनिया गांधी से पूछना चाहती है कि क्या वह 'हिंदू आतंक' जैसे शब्द का समर्थन करती हैं। भाजपा याकूब मेमन की फांसी और गुरदासपुर आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में हिंदू आतंक पर बहस के जरिये लोगों का ध्यान खींचना पसंद करेगी। यदि यह बहस बिहार के विधानसभा चुनाव तक जारी रहे, तो और बेहतर। इस तरह की कुटिल गणना वास्तव में यह नहीं दर्शाती कि भाजपा संसद के सुचारु संचालन के लिए प्रतिबद्ध है, जो कि सत्तारूढ़ पार्टी की मुख्य जिम्मेदारी है।

भाजपा को यह समझना चाहिए कि इस तरह का गणित राजनीति में तभी तक काम करता है, जब तक कि लोगों की नजरों में पार्टी की थोड़ी-सी साख बची रहती है। निस्संदेह आज भाजपा की साख जांच के दायरे में है।

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