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उनके सुनहरे सपने की कीमत

सुभाषिनी अली Updated Thu, 12 Dec 2013 08:43 PM IST
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Women exploitation in textile industries
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आज कल दो तरह के जुलूसों की धूम है। या तो हाल में हुए चुनावों में जीतने वालों के या फिर बारातियों के जुलूस। दोनों में बहुत अंतर है, लेकिन एक बात दोनों में सामान्य है। जिन चुनावों के बाद और जिन शादियों से पहले ये जुलूस निकल रहे हैं, दोनों दिन पर दिन ज्यादा महंगे होते चले जा रहे हैं। और दोनों को महंगा बना रही हैं, बाजार की ताकतें। चुनावों के महंगे होने पर टीका-टिप्पणी तो बहुत होगी, पर शादियां इतनी महंगी क्यों होती जा रही हैं, इस पर चिंता तो बेशक बहुत जताई जाती है, लेकिन विश्लेषण कम होता है।



शादियों के महंगा होने का मतलब है, लड़कियों के परिवार पर बोझ का बढ़ना। इससे परेशान कौन होता है, यह तो सबको पता है, पर इसे फायदा किसको पहुंचता है, अक्सर इसका जवाब मिलता है, लड़के वालों को। लेकिन लड़के वालों की भी तो बेटियां होती हैं, और वह भी लड़की वाले होते हैं, तो फिर फायदा किसे पहुंचता है? इसका सीधा-सीधा जवाब है, बाजार को। लड़की की शादी में जितना खर्च बढ़ता है, उतना ही बाजार जगमगाता है, इसलिए उसकी पूरी ताकत, लड़कियों की कीमत गिराने में जुटी रहती है।
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लड़कियों और महिलाओं की कीमत कम करने में, उनकी असमानता बढ़ाने में, बाजार की ताकतों को दोहरा लाभ पहुंचता है। पहला तो यह कि असमानता के साथ शादी का खर्च, यानी बाजार से सामान और सेवाओं की खरीदारी बढ़ेगी और दूसरा यह कि असमान महिलाओं का श्रम उसे सस्ते में मिल जाएगा। इस अजीब प्रतीत होने वाले तर्क का सबसे जबर्दस्त सबूत मिलता है, तमिलनाडु में प्रचलित सुमंगली योजना से।
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इस योजना का जन्म तमिलनाडु के कोयम्बटूर, तिरुपुर इत्यादि इलाकों के सूती उद्योग, खास तौर से सूत के कारखाने में हुआ। यह इस इलाके का परंपरागत उद्योग है, जिसमें 1990 के दशक तक पुरुष ही काम करते थे। देश में नव-उदारवादी नीतियां लागू होने के बाद श्रम कानूनों का क्रियान्वयन बहुत ही लचर होने लगा। इसके साथ ही, विदेशी कंपनियों ने अपना सामान वहां बनाना शुरू किया, जहां मजदूरी सबसे कम थी। दक्षिण भारत के इस इलाके के तमाम सूत, कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट्स उत्पादकों ने मौके का फायदा उठाते हुए ठेकेदारी प्रथा लागू करके स्थायी मजदूरों की संख्या को न के बराबर कर दिया और उनकी जगह नाबालिग लड़कियों को रखना शुरू किया।

1990 से लेकर आज तक इस योजना के अंतर्गत करीब डेढ़ लाख से अधिक लड़कियां काम कर रही हैं। उन्हें पंद्रह से बीस घंटे रोज काम करना पड़ता है। हर बात में उनके वेतन में कटौतियां की जाती हैं, जैसे अगर वह शौच के लिए दस मिनट से ज्यादा समय लेती हैं, तो उन्हें कटौती का सामना करना पड़ता है। हद तो यह है कि अगर वह बीमार पड़ती हैं (यह अक्सर होता है, क्योंकि काम की परिस्थितियां बहुत खराब हैं और फिर उनके फेफड़ों में अमूमन कपास के रेशे भर जाते हैं), तो उनके इलाज पर खर्च होने वाली राशि भी उनके वेतन से काट ली जाती है। जितने दिन का उनका ठेका होता है, उस दौरान वे अपने घर नहीं जा सकतीं। महीने में एकाध बार उन्हें सख्त पर्दे में जरूरी सामान खरीदने के लिए बाजार जाने की अनुमति मिलती है। जाहिर है, इन लड़कियों का किसी यूनियन जैसे संगठन से वास्ता नहीं बन पाता है। उनके साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाएं भी अक्सर होती हैं। पर लड़कियां चुपचाप सबकुछ बर्दाश्त कर लेती हैं।

लड़कियां ऐसा क्यों करती हैं? क्योंकि उन्हें पैदा होने के बाद, हर पल इस बात का एहसास दिलाया जाता है कि उनकी कोई कीमत है ही नहीं। उन्हें समझाया जाता है कि उनका जीवन सिर्फ और सिर्फ तभी सफल माना जाएगा, जब उनकी शादी हो जाएगी। यह तभी होगा, जब उसके इस एहसान के बदले उसके परिवार वाले उसे कुछ देंगे। शादी का उपाय है कि सुमंगली योजना के अंतर्गत वह तीन-चार साल अपने सपनों,आशाओं, स्वास्थ्य और शरीर, सबको चूर करके मशीन से बंधकर काम करे। फिर गाढ़ी कमाई के बदले उसे वर मिल जाएगा।

पाठक समझेंगे कि यह बीते दिनों की बात होगी, अब ऐसा थोड़ी न होता है। पर तमाम लोगों की कोशिशों के बावजूद अब भी ऐसा होता है। 2007 में तमिलनाडु के उच्च न्यायालय के सामने एक याचिका प्रस्तुत की गई थी, जिसमें सुमंगली योजना के तहत नाबालिग लड़कियों की बंधुआ मजदूरी की बात कही गई थी। याचिका की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि तमिलनाडु राज्य न्यायिक सेवा प्रतिष्ठान कमेटियां गठित करके राज्य के 17 जिलों की कपड़ा मिलों में औचक छापे डालेगी और न्यायालय को रिपोर्ट देगी। न्यायालय ने इन मीलों में होने वाली लैंगिक हिंसा पर भी चिंता व्यक्त की।

तबसे छह साल बीत चुके हैं। 2012 में मजदूरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन उचित श्रमिक संघ ने सुमंगली योजना में काम करने वाली 78 लड़कियों का सर्वेक्षण किया। इन सबने 16 वर्ष की उम्र में तीन साल काम करने का समझौता किया था, इनमें से 34 इस समझौते का पालन नहीं कर पाईं। चार काम पर दुर्घटना या बीमारी के कारण मर गईं, 11 ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से काम छोड़ दिया, 17 को मां-बाप घर ले गए और दो ने अन्य वजहों से काम छोड़ दिया। जो काम पर थीं, उनमें से अधिकतर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की, लेकिन कहा कि वे इसके खिलाफ बोलने के लिए तैयार नहीं थीं, क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें शादी न हो पाने का भय था।

लड़कियां अस्पतालों, बंगलों, ब्यूटी पॉर्लर, दुकानों, छोटे-छोटे दफ्तरों में हर तरह का काम करती हैं, जहां पैसे कम मिलते हैं, काम ज्यादा होता है। वह सिर्फ इस उम्मीद पर काम करती है कि एक दिन घोड़े पर बैठकर दुल्हा आएगा और शादी का खर्च वह अपनी कमाई से जुटा लेगी। सुमंगली भवः। सौभाग्यवती भवः। और बाजार की चकाचौंध बनी रहे।

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