क्राइम थामने को अपराध हजम कर रही पुलिस
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देहरादून में आसमान छूते क्राइम के ग्राफ को थामने के लिए पुलिस ने नया फार्मूला निकाल लिया है।
शिकायत लेकर थाने पहुंचे वाले लोगों को पुलिस मुहर लगाकर तहरीर की कॉपी थमा देती है। इसके बाद पुलिस आरोपी की तलाश में जुटती है।
पकड़ा गया तो मुकदमा दर्ज किया जाता है, नहीं तो मामला हजम कर लिया जाता है। यह फार्मूला लूट, ठगी और चोरी जैसे मामलों में ज्यादा अपनाया जाता है।
लोग मुहर लगी तहरीर को ही एफआईआर (फर्स्ट इंफोरमेशन रिपोर्ट) मान बैठते हैं। अमूमन ऐसे कम ही लोग होते हैं जो मुकदमा दर्ज करने के लिए पुलिस पर दबाव बना पाते हैं।
ऐसे में काफी घटनाएं हैं जो इस चाल बाजी के कारण आंकड़ों में शामिल नहीं हो पातीं।
इन केसों ने खोली पुलिस की पोल
देहरादून के केदारपुरम निवासी लाजवंती से प्रेमनगर में महिला से ढाई लाख रुपये की ठगी को पुलिस ने बीस दिन तक छिपाकर रखा।
पीड़िता को थाने से मुहर लगाकर टरका दिया गया। मामला मीडिया में सुर्खियां बना तो पुलिस ने मजबूरन मुकदमा दर्ज किया।
रायपुर क्षेत्र में होटल कर्मियों ज्ञान सिंह बिष्ट, जगबीर सैण समेत 15 युवकों को जापान भेजने के नाम पर एक शख्स ने साढे़ सात लाख रुपये ठग लिए।
उन्हें भी मोहर लगाकर तहरीर थमा दी गई। मोहर को ही रिपोर्ट मानकर यह लोग कई दिन तक कार्रवाई न होने की बात कहते रहे। मामला उछला तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की।
पहले तो पुलिस ने रिपोर्ट ही दर्ज नहीं की
प्रेमनगर में डंपर चोरी होने की घटना में पुलिस ने पहले रिपोर्ट दर्ज नहीं की। जब 72 घंटे बाद आरोपी हाथ आए तो रिपोर्ट दर्ज की गई। अगले दिन गुडवर्क का खुलासा किया गया।
पटेलनगर निवासी शीला देवी से भी चार दिन पहले दर्शन लाल चौक पर करीब डेढ़ लाख के कंगन ठग लिए गए।
पीड़िता को भी तहरीर पर मोहर लगाकर थमा दी गई। कई दिन की भागदौड़ के बाद भी पुलिस ने अब तक मामला दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई है।
हर अपराध पर पुलिस गंभीर
एफआईआर दर्ज करने के नियम
आपधारिक दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत पुलिस को हर संज्ञेय आपराधिक घटना की एफआईआर दर्ज करनी ही होगी।
इसमें किसी प्रकार की कोताही कानून का गंभीर उल्लंघन है। नियम यह है कि एफआईआर वादी की भाषा और शब्दों में अक्षरश: दर्ज किया जाए। पुलिस अपनी ओर से एफआईआर में तथ्यों को तोड़-मरोड़ नहीं सकती।
छोटे से लेकर बड़े अपराधों को लेकर पुलिस बेहद गंभीर है। छिपाने और
अल्पीकरण जैसी कोई बात नहीं है। यदि ऐसी कोई शिकायत मिलती है तो उस पर
कार्रवाई होती है। कुछ मामलों में तहरीर की वजह से मुकदमा दर्ज होने में
देर हो जाती है।
- अजय रौतेला, एसएसपी