मुसीबतों की मार झेल रहा उत्तराखंड का 'मिनी जापान'
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उत्तराखंड के भिलंगना में मिनी जापान कहे जाने वाले गांव आर्थिक रूप से तो संपन्न हो गए हैं, लेकिन वहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का अकाल पड़ा हुआ है। जिसका दर्द प्रवासियों को सता रहा है।
सुविधाओं के अभाव में जहां गांव के गांव खाली हो रहे हैं, वहीं माटी के मोह में बधे लोग अपने पुस्तैनी घरों में ही डटे हैं। भिलंगना ब्लॉक में हिंदाव पट्टी के ग्राम बडियार, सरपोली और पंगरियाणा में प्रत्येक घर का सदस्य जापान में नौकरी कर रहा हैं।
जापान में नौकरी करने वाले लोगों की संख्या दो सौ से भी अधिक है। विदेश में नौकरी करने से गांव में आर्थिक संपन्नता तो आ गई, लेकिन वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधा का टोटा बना हुआ है।
भविष्य के लिए गांव छोड़ने को मजबूर लोग
आर्थिक रूप से संपन्न कई परिवार अपने पाल्यों के सुखद भविष्य के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हैं। बावजूद गांव से मात्र दस फीसदी लोग ही देहरादून और ऋषिकेश गए हैं।
क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता फते सिंह, लाला चंद, कुंवर सिंह, कर्ण सिहं बताते हैं कि गांव में इंटर कॉलेज तो हैं, लेकिन वहां विज्ञान जैसा महत्वपूर्ण विषय नहीं पढ़ाया जाता।
पंगरियाणा में लाखों रुपए खर्च कर अस्पताल का भवन तो बना दिया गया, लेकिन वहां एक भी स्टाफ की नियुक्ति नहीं की गई है।
तिसरियाड़, सौंला, गनगर, केमरा आदि गांवों के अधिकांश लोग भी जापान में नौकरी कर रहे हैं, लेकिन वह गांव भी सुविधाओं की बाट जोह रहे हैं।