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Explainer: क्या है चुनाव याचिका, जिसे दायर कर राज्यसभा चुनाव विवाद में राहत पाने का मीनाक्षी के पास विकल्प

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 12 Jun 2026 07:42 PM IST
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सार

मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की गई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद युगलपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि मीनाक्षी अपनी इस याचिका को चुनाव याचिका के तौर पर आगे हाईकोर्ट में दायर कर सकती हैं।

Meenakshi Natarajan Rajya Sabha Nomination cancelled Congress Supreme Court Election Petition High Court
मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से झटका। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मध्य प्रदेश में खाली हुईं तीन राज्यसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। कांग्रेस की तरफ से एक सीट के लिए उम्मीदवार बनाई गईं मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज होने के बाद तीनों भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हुए। चुनाव आयोग के रिटर्निंग अफसर की ओर से अपनी उम्मीदवारी खारिज किए जाने के खिलाफ मीनाक्षी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि वह चुनाव से जुड़ी प्रक्रिया के मामले में दखल नहीं दे सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी को चुनाव याचिका के जरिए राज्यसभा चुनाव के विवाद को सुलझाने की छूट दे दी। 


ऐसे में यह यह जानना अहम है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन के मामले पर क्या टिप्पणी की? यह चुनाव याचिका यानी इलेक्शन पिटीशन क्या होती है, जिसे दायर करने की छूट दी गई है? यह कहां दायर होती है और कौन से मामले इसके जरिए ही सुलझाए जा सकते हैं? किसी चुनाव याचिका की सुनवाई की समयसीमा क्या होती है? अगर इस दौरान गलत तरह से चुना गया प्रतिनिधि कोई फैसला लेता है तो उनका क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- मीनाक्षी नटराजन का मामला क्या है?

मीनाक्षी नटराजन का नामांकन फॉर्म 26 में तेलंगाना के एक आपराधिक मामले का खुलासा न करने के कारण रिटर्निंग ऑफिसर की तरफ से खारिज किया गया। उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया कि जिस मामले का खुलासा नहीं किया गया उसमें केवल नोटिस जारी हुए थे और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत नामांकन को गलत तरीके से खारिज किया गया है, लेकिन न्यायालय ने इस स्तर पर कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट में मीनाक्षी नटराजन के मामले पर क्या टिप्पणी हुई?

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन को रद्द करने वाले रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश में दखल देने से सीधे तौर पर इनकार कर दिया। जस्टिस पीके मिश्र और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ ने फैसला सुनाया कि राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र खारिज होने को चुनौती देने वाली मीनाक्षी नटराजन की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। 

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार जब रिटर्निंग ऑफिसर की तरफ से किसी उम्मीदवार का नामांकन खारिज कर दिया जाता है, तो इसके समाधान के लिए केवल चुनाव आयोग के पास जाना ही एकमात्र उपाय है। अदालत ने मीनाक्षी नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा, "निर्णय चाहे कितना भी गलत क्यों न हो, एक बार नामांकन खारिज हो जाने के बाद, इसका उपाय आमतौर पर कहीं और होता है। क्या इस न्यायालय का कोई ऐसा निर्णय है जहां हमने इस स्तर पर हस्तक्षेप किया हो?।" 

सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन के मामले में स्पष्ट कर दिया कि चुनाव से जुड़े मामलों पर रिट याचिका के माध्यम से कोई राहत नहीं दी जा सकती। सिर्फ सांविधानिक मामलों में ही रिट याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट आया जा सकता है।

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यह चुनाव याचिका यानी इलेक्शन पिटीशन क्या होती है?

चुनाव याचिका संसदीय, विधानसभा या स्थानीय चुनावों के नतीजों की वैधता की जांच करने की एक वैधानिक प्रक्रिया है। आसान शब्दों में कहें तो, यह कानून के तहत किसी चुनाव में विजयी उम्मीदवार के निर्वाचन को अदालत में चुनौती देने का एक साधन है। 

चुनाव याचिका के जरिए कौन से मामले सुलझाए जा सकते हैं?

  • अगर चुनाव के दिन जीतने वाला उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए योग्य नहीं था या किसी वजह से अयोग्य था। इसके अलावा विजयी उम्मीदवार उसके चुनाव एजेंट या उनकी सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट आचरण का इस्तेमाल किया गया हो। 
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत रिश्वत देना, अनुचित प्रभाव डालना, डराना-धमकाना, बल प्रयोग करना, और धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाता है। 
  • इसके अलावा राष्ट्रीय प्रतीकों (जैसे राष्ट्रीय ध्वज) का इस्तेमाल करना, उम्मीदवार के चरित्र या उम्मीदवारी के बारे में झूठे बयान प्रकाशित करना, बूथ कैप्चरिंग करना, चुनाव खर्च का झूठा विवरण देना और चुनाव में फायदे के लिए सरकारी कर्मचारियों (जैसे पुलिस, सशस्त्र बल, मजिस्ट्रेट आदि) की मदद लेना भी इसी वर्ग में आता है।

  • अगर चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी उम्मीदवार के नामांकन पत्र को अनुचित या गलत तरीके से स्वीकार या अस्वीकार कर दिया गया हो। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत गलत तरीके से नामांकन का खारिज होना एक ऐसा आधार है जिस पर चुनाव संपन्न होने के बाद चुनाव याचिका दायर की जा सकती है।
  • अगर चुनाव में किसी वोट को गलत तरीके से स्वीकार किया गया हो, अस्वीकार किया गया हो, रद्द किया गया हो, या किसी अवैध वोट को गिन लिया गया हो।  हालांकि, ऐसा आरोप लगाते समय अदालत में यह स्पष्ट रूप से साबित करना होता है कि इन विसंगतियों (जैसे ईवीएम या वीवीपैट में गड़बड़ी) के कारण चुनाव नतीजे प्रभावित हुए हैं।
  • अगर चुनाव संपन्न कराने में भारतीय संविधान, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए), या इसके तहत बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों का पालन नहीं किया गया हो।

अगर अदालत की जांच में इनमें से कोई भी आधार सही साबित हो जाता है, तो हाईकोर्ट संबंधित उम्मीदवार के चुनाव को शून्य घोषित कर सकता है।


मीनाक्षी चुनाव याचिका दाखिल करती हैं तो फैसला कब तक?

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86(7) यह सुझाव देती है कि चुनाव याचिका की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी की जानी चाहिए। कानून के मुताबिक, हाईकोर्ट को याचिका दायर होने की तारीख से छह महीने के अंदर ट्रायल पूरा करने का प्रयास करना होता है। हालांकि, सच्चाई यह है कि कानून भले ही छह महीने का समय सुझाता है, लेकिन असल में अदालतों में चुनाव याचिकाओं के निपटारे में काफी ज्यादा समय लग जाता है। इसे लेकर अलग-अलग अदालतों ने चिंता भी जताई है। 

ऐसे में अगर मीनाक्षी नटराजन अपने मामले में चुनाव याचिका दायर करती हैं, तो कानूनी तौर पर अदालत को छह महीने में फैसला सुनाने का लक्ष्य रखना होगा। लेकिन मामले की जटिलता, सुनवाई की प्रक्रिया और हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के विकल्पों के कारण उन्हें अंतिम फैसला मिलने में वर्षों का समय लग सकता है।

चुनाव याचिकाओं के निपटारे में होने वाली भारी देरी पर हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट की भी आलोचना की है। हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट मोहम्मद अकबर मामले में अपने ही फैसले के उन सिद्धांतों का पालन करने में नाकाम रहा है, जिनमें चुनाव याचिकाओं की तुरंत सुनवाई पूरी करने की बात कही गई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से छह महीने की समयसीमा वाले नियम को सुविधाजनक रूप से नजरअंदाज किया जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव याचिकाओं के निपटारे के लिए तय छह महीने के नियम का पालन न करना लोकतंत्र और मताधिकार की सच्ची भावना को कमजोर करता है।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह कड़ी टिप्पणियां 2016 के राधापुरम विधानसभा चुनाव विवाद (एम. अप्पावु बनाम आईएस. इनबदुरई) की सुनवाई के दौरान कीं। इस मामले में याचिका दायर होने के 10 साल बाद जाकर हाईकोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया और चुनाव रद्द करते हुए एम. अप्पावु को जीता हुआ घोषित किया।

गलत तरह से चुना गया प्रतिनिधि कोई फैसला लेता है तो उनका क्या असर होगा?

अगर चुनाव याचिका की सुनवाई के बाद किसी जीते हुए उम्मीदवार का चुनाव अदालत की तरफ से रद्द या शून्य घोषित कर दिया जाता है, तो उस प्रतिनिधि की तरफ से अपने पद पर रहते हुए किए गए कामों या लिए गए फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ता। चुनाव रद्द होने वाले आदेश के कारण उस उम्मीदवार द्वारा प्रतिनिधि के रूप में किए गए कार्य या सदन की जिन भी कार्यवाहियों में उसने हिस्सा लिया है, उन्हें अमान्य नहीं माना जाएगा। इसके अलावा सदन की कार्यवाहियों में हिस्सा लेने या फैसले लेने के आधार पर उस व्यक्ति पर कोई जवाबदारी नहीं होगी और उस पर कोई जुर्माना भी नहीं लगाया जाएगा। 

पहले किन बड़े मामलों में दायर हुई हैं चुनाव याचिका?

भारत में पहले भी कई प्रमुख नेताओं और मामलों में चुनाव याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। इनमें इंदिरा गांधी से लेकर हालिया समय में मनीष सिसोदिया तक के मामले शामिल हैं।

इंदिरा गांधी: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ भ्रष्ट चुनावी आचरण के आधार पर एक ऐतिहासिक चुनाव याचिका दायर की गई थी। इसके परिणामस्वरूप उन्हें छह साल की अवधि के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया गया था। आज उस अहम मामले के 50 साल भी पूरे हुए हैं। माना जाता है इलाहबाद हाईकोर्ट का वह फैसला भी इंदिरा की तरफ से आपातकाल लगाने की एक वजह बना था। 

पी. चिदंबरम: पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के खिलाफ भी भ्रष्ट आचरण और वोटों के हेरफेर के आरोप में चुनाव याचिका दायर की गई थी।

अशोक चव्हाण और मधु कोड़ा: 2009 के चुनाव के दौरान अखबारों के विज्ञापनों पर हुए चुनाव खर्च को कम करके दिखाने के मामले में अशोक चव्हाण और मधु कोड़ा के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की गई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 45 दिनों के भीतर जांच करके फैसला लेने का आदेश दिया था।

मनीष सिसोदिया: दिल्ली हाईकोर्ट में मनीष सिसोदिया की 2020 की पटपड़गंज विधानसभा जीत को चुनौती देने वाली एक चुनाव याचिका दायर की गई थी, जिसे बाद में अदालत ने खारिज कर दिया था।

एम. अप्पावु बनाम आईएस. इनबदुरई: 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में पोस्टल बैलेट और वोटों की गिनती को लेकर एम. अप्पावु ने एआईएडीएमके के आईएस. इनबदुरई की जीत को चुनौती दी थी। इस चुनाव याचिका का फैसला आने में 10 साल का लंबा समय लगा, जिसके बाद मद्रास हाई कोर्ट ने एम. अप्पावु को विजयी घोषित किया था। हालांकि, आईएस इनबदुरई विधायक रह चुके थे।
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