मोदी की जीत से बदला 'टाइम' का सुर, नई रिपोर्ट में लिखा- देश को एक सूत्र में पिरोने वाला पीएम
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लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत के बाद प्रतिष्ठित अमेरिकी मैगजीन ‘टाइम’ ने अपने सुर बदलते हुए बड़ा यू-टर्न लिया है। चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले 10 मई के लेख में मोदी को ‘भारत का डिवाइडर इन चीफ’ यानी ‘प्रमुख विभाजनकारी’ बताने वाली इस अंतरराष्ट्रीय मैगजीन (पत्रिका) ने नतीजों के बाद मोदी पर एक और लेख छापा है।
28 मई को टाइम की वेबसाइट पर यह लेख ‘मोदी हेड यूनाइटेड इंडिया लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डेकेड्स’ शीर्षक से छापा गया है जिसका अर्थ है- ‘मोदी ने भारत को इस तरह एकजुट किया है जितना दशकों में किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया’।
लेख में लिखा गया है कि मोदी ने भारत को एकजुट किया और देश में जाति व धर्म की खाई कम कर दी। लेख में यह भी लिखा गया कि नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से देश को संगठित किया है वह कोई और पीएम दशकों में नहीं कर पाया है। यह लेख लोकसभा चुनाव के दौरान ‘नरेंद्र मोदी फॉर पीएम’ नामक अभियान चलाने वाले मनोज लडवा ने लिखा है। उन्होंने लिखा, ‘मोदी की सामाजिक रूप से प्रगतिशील नीतियों ने हिंदू और धार्मिक अल्पसंख्यकों समेत तमाम भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला है। यह किसी भी पिछली पीढ़ी के मुकाबले तेज गति से हुआ है।’
टाइम पत्रिका में छपे लेख के मुताबिक, मोदी ने कटु व अक्सर अन्यायपूर्ण आलोचनाओं के बीच अपने पिछले कार्यकाल और इस मैराथन चुनाव में मतदाताओं को जिस तरह एकजुट किया वैसा पिछले पांच दशकों में कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर सका। टाइम की वेबसाइट पर यह लेख सर्वाधिक पढ़े गए लेखों में शीर्ष पर है। इसमें मोदी का एक वीडियो भी है, जिसमें वह जोर दे रहे हैं कि किसी से कोई भेदभाव नहीं होगा।
पिछले विवादित लेख पर हुई थी आलोचना
ताजा लेख से पहले 10 मई को टाइम में छपे आतिश तासीर के लेख पर काफी विवाद हुआ था। चुनाव के दौरान प्रकाशित इस लेख का इस्तेमाल मोदी के विरोधियों ने प्रचार में खूब इस्तेमाल किया था, जिसकी मोदी समर्थकों ने आलोचना की थी। इस लेख में तासीर ने लिंचिंग के मामलों और यूपी में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने समेत कई बातों को लेकर मोदी सरकार की आलोचना की थी।
इंदिरा गांधी का भी जिक्र
‘टाइम’ में छपे इस लेख में इंदिरा गांधी को 1971 में मिली जबरदस्त जीत का भी जिक्र किया गया। लेख में कहा गया है कि इंदिरा गांधी ने भले ही देश में भारी जीत दर्ज की थी लेकिन इसके बावजूद मोदी की जीत बहुत अधिक प्रभावशाली रही, क्योंकि मोदी को जिस तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है वैसा उस वक्त इंदिरा जी को नहीं करना पड़ा था।
संकटग्रस्त पत्रिका है ‘टाइम’
वास्तविकता यह है कि ‘टाइम’ एक संकटग्रस्त अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है, जिसका स्वामित्व एक ही साल के भीतर दो हाथों में जा चुका है। पिछले साल मार्च में इसे बेटर होम्स और गार्डन्स जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशक मेरेडिथ ने खरीदा था। उसके बाद सितंबर में यह दोबारा बिकी, जब इसे सेल्सफोर्स के संस्थापक और टेक उद्यमी मार्क बेनिऑफ तथा उनकी पत्नी ने खरीदा।
मोदी ने पहली बार कांग्रेस को चुनौती दी
टाइम मैग्जीन ने 1947 के उस इतिहास का जिक्र भी किया, जब भारत को आजादी मिली थी और बताया कि किस तरह पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता को सरकार का मूल माना। लेकिन बदलते वक्त के साथ कांग्रेस का वंशवाद भारतीय राजनीतिक का एक प्रमुख चेहरा बन गया। कांग्रेस को कई दलों ने चुनौती पेश की, लेकिन 2014 का साल बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर एक ऐसे शख्स (नरेंद्र मोदी) का अवतरण हुआ जो कांग्रेस की उन नीतियों और सिद्धांतों का विरोध कर रहा था जिसे कांग्रेस पार्टी अपनी कामयाबी के रूप में पेश करती थी। 2014 में जब नतीजे सामने आए तो कांग्रेस पूरी तरह सिकुड़ चुकी थी। एक ऐसी पार्टी जो भारत के सभी हिस्सों पर राज कर चुकी थी उसके लिए संसद में नेता विपक्ष के लिए आवश्यक आंकड़ों की कमी पड़ गई।
चुनावों के आखिरी चरण में टाइम मैगजीन ने मोदी पर छापी विवादास्पद रिपोर्ट
नेहरू-गांधी परिवार से उलट मोदी के पास गरीबी और अभावों का अनुभव
नरेंद्र मोदी देश के एक ऐसे तबके से आते हैं, जो बेहद गरीबी और अभावों में जीता है। उन्होंने जिस तरह से फर्श से अर्श तक का सफर पूरा किया है, उससे देश का गरीब और मध्य वर्ग उन्हें अपने बीच का मानता है और आदर्श के रूप में देखता है। जबकि 72 वर्षों तक देश की बागडोर संभालने वाला नेहरू-गांधी परिवार इस तरह के अनुभव से वंचित ही रहा है।
काम के बदले मिला जीत का तोहफा
‘टाइम’ में प्रकाशित लेख के मुताबिक, नरेंद्र मोदी की दोबारा जीत इस बात का सबूत है कि भारतीय जनता ने काम के बदले जीत का तोहफा दिया है। इसका श्रेय उन नीतियों को जाता है, जिनका सीधा असर देश की गरीब जनता पर पड़ा और उन्होंने बदलाव को महसूस किया। मोदी सरकार की प्रगतिशील नीतियों का ही नतीजा रहा कि देश के हिंदू और अल्पसंख्यकों की गरीबी तेजी से घटी है। जबकि पूर्ववर्ती सरकारों में यह दर काफी धीमी थी।
अर्थव्यवस्था को दी स्थिरता
मोर्गन स्टेनली ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था अस्थिर है और कभी भी ढह सकती है। इसका जिक्र करते हुए ‘टाइम’ ने लिखा है कि मोदी ने 2014 में कांग्रेस सरकार से विरासत में मिली अस्थिर अर्थव्यवस्था को स्थिर किया है। अब वही अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई और तेजी से बढ़ भी रही है।
मोदी द्वारा शुरू की गई योजनाओं ने उन्हें विश्व पटल पर चर्चा दिलाई। प्रधानमंत्री जनआरोग्य और प्रधानमंत्री आवास योजना ऐसे कार्यक्रम रहे, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा और लाभ भाजपा के खाते में आया। ये ऐसे फैसले थे, जो पूर्ववर्ती सरकारों ने कभी नहीं लिए थे।
साल 2014, 2015 और 2017 में टाइम मैगजीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था। मई 2015 में पत्रिका ने मोदी पर कवर स्टोरी की थी और उसे नाम दिया था- 'व्हाय मोदी मैटर्स' ('Why Modi Matters')। प्रकाशित आलेख में कहा गया था कि मोदी ने भारत की महान शख्सियतों पर राजनीतिक हमले किए जैसे कि नेहरू।
वह कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं, उन्होंने कभी भी हिंदू-मुसलमानों के बीच भाई-चारे की भावना को मजबूत करने के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। इस लेख में आगे लिखा था कि नरेंद्र मोदी का सत्ता में आना इस बात को दिखाता है कि भारत में जिस कथित उदार संस्कृति की चर्चा की जाती थी वहां पर दरअसल धार्मिक राष्ट्रवाद, मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं और जातिगत कट्टरता पनप रही थी। लेकिन ताजा लेख में मोदी की प्रचंड जीत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।