..जब कश्मीर में सबसे ज्यादा असरदार रही नोटबंदी, एक फैसले से रूकी थी 4 महीने चली हिंसा
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साल 2016 का वक्त, आठ जुलाई को हिजबुल कमांडर बुरहान मुजफ्फर वानी को त्राल में एसओजी और सेना की एक संयुक्त मुठभेड़ में मार गिराया गया। उस वक्त जब बुरहान को सुरक्षाबलों ने एक घर में घेरा तो कश्मीर की तमाम जमात अपने आने वाले कल और उसमें होने वाले तमाम विवादों से बेखबर थी।
त्राल की घेराबंदी के बीच पत्थर चलते रहे लेकिन जांबाज सेना के जवानों ने कश्मीर में आतंक के उस पोस्टरी चेहरे को मार गिराया जिसकी शह पर स्थानीय आतंक के तमाम मंसूबे पाले जा रहे थे। बुरहान के अंत के साथ कश्मीर में तनाव के एक अजीब सन्नाटे की शुरूआत हुई।
शुक्रवार के उस रोज हुई मुठभेड़ के बाद शनिवार ने कश्मीर में पत्थरबाजी की एक और सुबह देखी। त्राल, शोपियां, अनंतनाग समेत दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में हिंसा शुरू हुई। इस दिन से शुरू हुई हिंसा ने चार महीने के वक्त तक कश्मीर को एक काले भविष्य में झोंक दिया। जुलाई से शुरू हुई हिंसा में कई मौत हुई, हजारों जख्मी तो लाखों को अपनी आम जिंदगी को कई महीनों कर हिंसा के काले कल में जकड़ा देखा।
जब चार महीने की हिंसा के बाद सरकार ने बैन कर दिए नोट
कश्मीर के स्कूल बंद कर दिए गए, बाजार से लेकर हर चौराहे पर सिर्फ बाड़ के मोटे तार, पत्थरों के ढेर और सुरक्षाबलों की भीड़ दिखाई देने लगी। कश्मीर शायद अपने सबसे मुश्किल कल को देख रहा था।
हर तरफ जहां कश्मीर के हालात लोगों की मुश्किलों को दिखा रहे थे वहीं इस बात की चिंता दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी कि कश्मीर के इस सबसे मुश्किल वक्त का अंत कैसे होगा। हिंसा के वक्त में जलते कश्मीर के तमाम स्कूल जलने लगे थे।
इन सब के बीच 8 नवंबर की रात भी कश्मीर में हिंसा की खबरें टीवी का हिस्सा बन रही थीं, तभी सरकार ने एक फैसला किया। रात करीब साढ़े आठ बजे हुए एक एलान के बाद कश्मीर में 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए।
एक फैसले ने दूसरे ही दिन बदले कश्मीर के हालात
शायद ये अविश्वसनीय सा लगे पर नोटबंदी के इस फैसले के तुरंत बाद कश्मीर के तमाम इलाकों में हिंसा के हालातों का दौर बदलने लगा। घाटी के जिन इलाकों में पत्थरबाजी में सैकड़ों लोग घायल हुए थे वहां की सड़कों पर इस बार कोई पत्थरबाज नहीं दिखा।
दिहाड़ी के सहारे कश्मीर में हिंसा का खेल खेलने वाली तंजीमों के पास पड़े सारे पैसे कागज के टुकड़े बन गए थे। जिन पैसों से कश्मीर में हिंसा के लिए फंडिंग की जा रही थी उनका वजूद मिट चुका था। कश्मीर के हालात सुधरने के लिए ये एक अहम फैसला था।
नोटबंदी के बाद फंडिंग के रास्ते बंद हो गए, विदेशों से नापाक रास्तों से आए पैसे भी अब महज एक कागजी ढेर से बने तो अलगाववादियों ने आवाम को भड़काने की भी कोशिश की पर बिना पैसों के मंसूबे टूट गए। कश्मीर का वक्त बदलने लगा था, नोटबंदी की असरदारी दिखने भी लगी थी। करीब सवा साल के वक्त के बाद नोटबंदी के असर पर आज सारे देश में चर्चा हो रही है। ऐसे वक्त में कश्मीर के उस वक्त को भी सनद रखना होता है जिसने आम आवाम को शायद घाटी के सबसे मुश्किल वक्त से आजादी दी थी।