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महाशिवरात्री

                
                                                         
                            थी मेरी ये ही ख्वाहिश
                                                                 
                            
तेरे चरणों में हो मेरी रिहाइश
दीदार तेरा करलू आंखो से
हर बार नाम पहले लूं सांसो से
इतनी देर में,चाहे जकड़ लू यम के फांसो से
मैंने आस रखी तेरी हर चौखट की
मिले ना तो, फिर धूली बनूं मरघट की
बैठे बैठे देखा वहीं गुनगुनाते कई आते थे
बिन बोलो के क्या बतलाते थे
कहता कुछ नहीं तू , फिर भी हंस-हंस जाते थे
गूंगा आया जोर जोर से बोला था
56 भोग के भार से तौला था
सुन महाशय लिए पोथी पीछे-पीछे दौड़ा था
आवाज दी तो उसने ओर मुख मोड़ा था
देखी वेश भूषा आदर से करो को जोड़ा था
दान करो ये उपाय बताया था
ज्ञान से खूब समझाया था
जैसे श्री कृष्ण ने गीता उपदेश बतलाया था
जान लिया ये सब मोह के परवाने है
आते ये तो मन को मनाने है
श्रद्धा घरों को बदला पांखड की दुकानों में

भटकता भटकता आया ,मैं वीरानों  में
तू ना मिला दीवारों से घिरें मकानों में  
ढूंढता चांद तारों के उजालो में
कैद पड़ा सोने चांदी के तालो में
रहता होगा तू , पत्थरों के महलों में
तेरी बस्तियों यानी जंगलों में
अंधेरों से घिरें तह-खानों में
हरे भरें मैदानों में।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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